Friday, February 10, 2017

विकास बनाम आदिवासी प्रतिरोध की संस्कृति

विकास बनाम आदिवासी प्रतिरोध की संस्कृति
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वे जो शिकार खेला करते थे निश्चिंत
जहर बुझे तीर से
या खेलते थे
रक्त-रंजित होली
अपने स्वत्व की आंच से
खेलते हैं शहर के
कंक्रीटीय जंगल में
जीवन बचाने का खेल
शिकारी शिकार बने फिर रहे हैं
शहर में
अघोषित उलगुलान में
लड़ रहे हैं जंगल
लड़ रहे हैं ये
नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ
जनगणना में घटती संख्या के खिलाफ
गुफाओं की तरह टूटती
अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ
ये पंक्तियाँ युवा कवी अनुज लुगुन की चर्चित कविता अघोषित उलगुलान से हैं |
उलगुलान झारखंड में बिरसा मुंडा द्वारा चलाये गये आन्दोलन की संज्ञा है , जिसका शाब्दिक अर्थ क्रान्ति है | किन्तु आज उलगुलान अन्याय अत्याचार के खिलाफ हर तरह के आदिवासी प्रतिरोध का नारा बन चुका है | उलगुलान और अंध विकास आज हर मोर्चे पर आमने सामने है | अंध विकास के पैरवीकर्ता अपने विपक्षियों का “उलगुलान” कहकर मज़ाक बनाने से भी बाज़ नहीं आते |
मेधा पाटकर आदिवासियों के बीच उनके साथ संघर्ष करने के लिए जानी जाती हैं | नर्मदा बचाओ आन्दोलन की पैरवी के लिए वे अक्सर जबलपुर आती थी | उनसे एक मुलाक़ात में मैंने पूछा .. दीदी आप विकास के खिलाफ हो ऐसा लोग बोलते हैं..आप विकास क्यों नहीं चाहते ? उन्होंने अपनी आदिवासिन साथिन की तरफ इशारा कर जबाब दिया था “ मै इनके साथ हूँ और जो विकास इनके खिलाफ है मै उसके खिलाफ हूँ |” कोई विकास किसी व्यक्ति के खिलाफ कैसे हो सकता है ? इसे जानना हो तो अरुंधती राय की किताब “ न्याय का गणित “ से जाना जा सकता है | मोटे तौर पर इसकी स्थापना यह है कि असमान समाज में एक के लिए विकास दूसरे के लिए विनाश लेकर आता है | भारत जैसे देश में विकास के नाम पर भारी संख्या में आदिवासी विस्थापित हुए है | और विकास की कीमत उन्होंने अपने जल-जंगल-जमीन खोकर चुकाई है | उन्होंने इस विकास की केवल कीमत अदा की जबकि उनके हिस्से का मुनाफा मुनाफाखोर हड़प ले गए | नर्मदा बाँध जैसी बड़ी परियोजनाओं के आंकड़े से अरुन्धती राय बताती हैं कि कितने दलित आदिवासी इन बांधो के लिए अपने गाँव-घर से उजाड़े गए | और इसका फ़ायदा किस तबके को सबसे ज्यादा हुआ | यानी पेट मछली का फटा और स्वाद मेहमान का बढ़ा | बांध और विस्थापन पर वीरेन्द्र जैन का ‘डूब’ भी याद आता है इसमें पात्र ‘माते’ के माध्यम से कथा कही गई है। विकास योजनाओं के नाम पर विनाष को अभिशप्त ग्रामीणों की व्यथा इसमें चित्रित है। माते का विश्वास वर्तमान विकास जैसे में नहीं है माते कहता है- ‘‘उस विकास से क्या फायदा जो मनुष्यों को उखाड़ दे, बेघरबार कर दे, उन्हें गलत जगह रोप दे, उनकी सहज इच्छाओं को रौंद दे?’’ ऐसा विकास समाज के वंचित तबके की कुर्बानी पर पलता है | यह ऐसा छलिया है जो मुआवजे के कुछ टुकड़ो को पुनर्वास कहता है | इसके पैरोकार शोषण के सबसे कुरूप चक्र को नियति ,न्याय जैसे सुन्दर शब्दों का रंग रोगन कर उसे मानवीय इतिहास की अपरिहार्यता के रूप में सथापित करते आये हैं |
जंगल जिनका माँ-बाप ,संगी-साथी हो जंगल पर जिनकी आत्म निर्भरता है और हुनर टिका हो उन्हें खेती के नाम पर बंजर जमीन का एक टुकडा देना उनका पुनर्वास कैसे कहा जा सकता है | अव्वल तो जंगल की उपज को इकठ्ठा करने का हुनर जानते हैं ना कि खेती और यदि खेती सीख भी जायें तो उन्हें मिली जमीन पर खरपतवार तक नहीं होती |इसका और भीषण उदाहरण चुटका परमाणु बिजली परियोजना है | ‘चुटका’ जबलपुर से ही कोई ५० किलोमीटर दूर मंडला जिले का एक आदिवासी बहुल्य गाँव है | चुटका में कनाडा के सहयोग से परमाणु बिजली परियोजना निर्माणाधीन है | अब इस परियोजना के लिए जंगल से कुछ गाँव को उजाड़ देना उतना गम्भीर सवाल नहीं है जितना गम्भीर यह सवाल कि चुटका नर्मदा बेसिन में स्थित होकर अत्यंत भूकंप संवेदी क्षेत्र है | सन 1997 में इस इलाके में रिएक्टर पर 6.4 की तीव्रता का भूकंप आकर जान-माल की हानि कर चुका है | ज़रा कल्पना करें कि भूकंप के लिए सम्वेदनशील इस क्षेत्र में भूकंप आया तो चुटका के चारो और लगे जंगल के आदिवासी गांवो में क्या तबाही का मंज़र होगा | इस परमाणु बिजली से जहां बड़े नगर और बड़े उद्योग रौशन होंगे वही एक लटकी तलवार के साये सोने-जागने के लिए सिर्फ आदिवासी गाँव मजबूर होगें | एक दूसरा खतरा नर्मदा नदी और बरगी बांध से जुड़ा है | इस संयंत्र का पानी नर्मदा में छोड़ा जावेगा जिससे नदी के पानी का ताप १० डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ने की सम्भावना है | यह तापमान जहाँ नदी की मछलियों , जीव जन्तुओ , जड़ी बूटी को नुकसान पहुंचाकर उस पर निर्भर आदिवासी के जीवन को खतरे में डालेगा बल्कि उसके सामने पीने के पानी का बुनियादी संकट तक खड़ा कर देगा | लेकिन इन प्रश्नों पर फ़िक्र करने की उन्हें शायद ही जरूरत हो जो दिल्ली भोपाल में बैठते हैं क्योंकि इतनी दूर वे हर जोखिम से दूर हैं | हाँ लाभ के सबसे करीब |
परमाणु संयंत्र के इसी खतरे यानी परमाणु विकिरण पर व्यवस्था द्वारा आदिवासियों के साथ किये जा खिलवाड़ को महुआ माजी ने अपने उपन्यास ‘ मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’ में सामने रखा है | मरंगगोड़ा वे इसमें सवाल उठाकर आदिवासी समाज के वक्तव्य की तरह उपन्यास को प्रस्तुत करती हैं | आदिवासियों के विपर्यस्त समय की विपर्यस्त दास्तान नहीं एक हलफनामे की तरह इसे पढ़ा जाना चाहिए | महुआ माजी ने पूरे शोध के साथ झारखंड की यूरेनियम खदानों से निकलने वाले विकिरण, प्रदूषण और उसके बीच आदिवासियों के विस्थापन की पीड़ा रेखांकित किया है जैसे -“ परमाणु सयंत्रों में एक हजार मेगावाट बिजली पैदा करने से करीब 27 किलोग्राम रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न होता है और उसे निष्क्रिय होने में एक लाख साल से ज्यादा लग जाते हैं|” जपान के परमाणु वैज्ञानिक प्रोफसर बोयदे ने मरंग गोड़ा आकर परीक्षण करने पर पाते हैं कि वहाँ हवा में गामा किरणों की मात्रा सामान्य से दस गुना अधिक है| यहाँ युवा ‘संगेन’ आदिवासियों के प्रतिरोध को अभिव्यक्ति देता है | महुआ माजी अंत में वैकाल्पिक माडल पर भी चर्चा करती हैं |विकास का समावेशी प्रारूप को भी प्रस्तुत किया गया है |
विकास का यह फरेबी खेल आज से नहीं है बरसों पहले से जारी है | आदिवासी इस फरेब को समझटता था और उसने हर दौर में इसका सशस्त्र प्रतिरोध भी किया | यही वजह है ब्रिटिश उपनिवेश के विरुद्ध जहाँ आदिवासी समाज से बाहर पहला संगठित विद्रोह १८५७ में हुआ वहीँ आदिवासी इलाको में ब्रिटिश औपनेवेशिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष खासी विद्रोह के रूप में १८२९ हो गया था | कोल विद्रोह १८३१ खामती विद्रोह , नागा विद्रोह सहित अनेक विद्रोह १८५७ की क्रान्ति के पहले ही आकार ले चुके थे और आदिवासी समाज की प्रतिरोधी क्षमता की मिसाल है | और ये सभी आन्दोलन केवल इसका परिणाम नहीं थे उनके रीति रिवाज को अंग्रेजो के कारण संकट उत्पन्न हो गया था अपितु जैसा कि विपिन चन्द्र इतिहासकार कहते हैं इसके पीछे असली कारण आर्थिक था | अंग्रेजों की मालूम था देश की असली सम्पदा जंगल और खदानों में हैं | जिसकी रखवाली में आदिवासी कायम है |आदिवासी खुद को जल जंगल का मालिक मानता था | जल जंगल उसका देवता था | इसी देवता की रक्षा लिए उसका संघर्ष वैदिक काल में यज्ञ-याज्ञ के अनुयायियों से हुआ था जिन्होंने ‘रक्ष’ होने से उन्हें राक्षस, दस्यु ,निषाद जाने क्या-क्या कह डाला था | आज भी जो कथित सभ्य समाज द्वारा जंगली बर्बर आदि नाम से पुकारे जाते हैं | उसका एक ही अपराधथा कि वह उस प्रकृति के साहचर्य से वंचित नहीं होना चाहता था जिसे वह प्रेम करता था और जिसकी पूजा करता था |
खैर जब अंग्रेजो ने भी क़ानून बनाकर एक झटके में आदिवासी को अपने ही घर यानी जंगल में वेघर कर दिया तो आदिवासी के सामने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए एक ही रास्ता बचा था यानी ‘उलगुलान’ |
आदिवासी अपने जीवन निर्वाह के लिए वनों से शहद, फल, लकड़ी, बांस जैसी वनोपज लेते थे। बांस का समान बनाना, पशुओं का शिकार, तथा मछली पकड़ना इनका प्रमुख उद्योग थे। सरकार ने वनों को सरकारी सम्पत्ति घोषित किया और अब आदिवासियों को जंगल से अन्य वन उपज संग्रह करने की स्वतन्त्रता नहीं रही। इस प्रकार जंगल कानूनों के जरिये परम्परागत अधिकारों का अपहरण हुआ, जिनसे आदिवासियों की मुश्किलात बढ़ती गयी |
प्रो. विपिनचंद्र ने लिखा है कि आदिवासी इलाकों में बाहरी लोगों और औपनिवेशिक राज की घुसपैठ ने उनकी पूरी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को ही उलट-पुलट दिया। उनकी जमीन उनके हाथ से निकलती गई और वे धीरे- धीरे किसान मज़दूर होते चले गये। इसके पहले वे भोजन ईंधन और पशुओं के लिए चारा आदि जंगलों से जुटाते थे, खेती के उनके अपने तरीके थे। वे जगह बदल- बदल कर 'झूम ' और 'पडु' विधियों से खेती किया करते थे। यानि जब उन्हें लगता था कि उनके खेत अब उपजाऊ नहीं रह गये तो वे जंगल साफ कर खेती के लिए नई जमीन तैयार कर लेते थे। ......आदिवासी इलाकों में ब्रिटिश सरकार द्वारा नवीन आबकारी कर वसूल किये जाने लगे। यहाँ तक कि नमक व अफीम पर भी कर लगाये गये। १८२२ में चावल की कम नशीली शराब पर उत्पादन शुल्क लगा दिया गया जिसे आदिवासी अपने प्रयोग के लिए तैयार करते थे और इसी आधार पर १८३० में प्रति घर के हिसाब से चार आना कर वसूल किया जाने लगा। १८२७ में पोस्त की खेती जबरन शुरू की गयी। इससे बेचैनी बढ़ती गयी।(प्रो विपिन चन्द्र )
अपनी जमीन से बेघर आदिवासी अब महाजन के यहाँ बेगारी करने को विवश होने लगा और पीढ़ी दर पीढ़ी शोषित होने के अभिशप्त हो गया | अब अपनी सम्पदा यानी जंगल में उसका कुछ भी करना अपराध था | मालिक देखते-देखते अपराधी घोषित कर दिये गये | और असली अपराधी यानी वन और खनिज के तस्कर मालिक बन बैठे | आदिवासी तीन पाटो के बीच पिसने लगा यानी दलाल,अफसर और तस्कर |
लेकिन आदिवासी को अपने साथ हो रहे इस शोषण चक्र से अनभिज्ञ था यह कहना गलत होगा |आदिवासियों के ऐतिहासिक विद्रोहों यह सिद्ध करते हैं कि अपने शोषण के विरुद्ध वह तब जागा हुआ था जब समूचा देश सोया हुआ था |
‘हूल विद्रोह’ जिसे क्रान्ति दिवस के रूप भी याद करते हैं ३० जून १८५५ में संथाल नेता सिद्धू ने घोषणा की थी “करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो यह आन्दोलन “ यह सशस्त्र आन्दोलन संथालो ने मालगुजारी के खिलाफ छेड़ा था | सिद्धू और कान्हू को सरेआम अंग्रेजो के फ़ासी देने के बाद भी जैसा कि इतिहासकार हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ़ रूलर बंगाल’ में लिखा है डुगडुगी बजती रही और संथाल लड़ते रहे |उसके अनुसार लगभग २० हज़ार संथाल मारे गये |
हूल विद्रोह की तरह मुंडा विद्रोह ‘उलगुलान’ था | जिसका नेतृत्व ‘धरती-बाबा’ बिरसा मुंडा ने किया | यह आन्दोलन भी अंग्रेजो की राजस्व नीतियों जमीदारी शोषण और बेगार प्रथा के खिलाफ १८९४ से शुरू होकर 1900 तक चला जिसमे हजारो की संख्या में मुंडाओ ने अपना बलिदान दिया |
और ऐसे कई आंदोलनों से गुजरते हुए आज भी देश का आदिवासी अपने पुरखे-देवता यानी जल जंगल जमीन को बचाने के लिए भूमंडली करण के दौर में “ग्लोबल गाँव के देवता” की पिशाची शक्तियों से मुकाबला कर रहा है | विकास से विस्थापन झेलता हुआ वह वह ओडिशा के नियमगिरी पर्वत पर खनन के खिलाफ लड़ रहा है | तो मारंगगोड़ा में यूरेनियम खनन और बाक्साईट खनन के खिलाफ लड़ रहा है | चुटका से लेकर कोडीकोलन तक परमाणु विभीषिका के खिलाफ डटा है और ऐसा नहीं कि उसका प्रतिरोध बेकार जाया हो रहा है | उसकी आवाज़ का असर ही था कि वेदान्ता ग्रुप को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा |
आदिवासियों के मध्य प्रतिरोध का यह जज्बा अभी का नहीं है बल्कि उनके यहा प्रतिरोध की यह परम्परा बहुत पुरानी है |जिसका ज़िक्र संजीव की कहानी “दुनिया की सबसे हसीन औरत’ में मिलता है | एक ट्रेन में एक औराव आदिवासिन जिसके चेहरे पर तीन गोदने के दाग हैं यात्रा कर रही होती है | ट्रेन के दूसरे यात्रियों द्वारा उसका उपहास बनाया जाता है | तब कहानी का नेरेटिव सामने आता है कि किस तरह तह समाज अपने प्रतिरोध को उत्सव की तरह से मनाता है अपनी हार को भी वह हार नहीं उत्सव मानता है ताकि आगे जीत सके |
ओराव के गोदना की गाथा यह है कि मुग़ल काल में सरहुल के पर्व पर समाज की रानी ने औरतो की सेना बनाकर मुग़ल सेना से लोहा लिया | ओराव सेना तीन बार जीती लेकिन चौथी बार हार गयी तब विजेता ने उनकी औरतों के चेहरों को तीन बार गरम सलाखों से दागा |
जिसकी याद में ये औरते अपने चेहरे पर तीन गोदना आज भी गुदवाती हैं और हर बारहवे साल वे सब उसकी याद में उत्सव की शक्ल में जुटती हैं |
संजीव ऐसी ही दुनिया की सबसे हसीन औरत कहते हैं |
और यह सही भी है प्रतिरोध करते व्यक्ति से सुन्दर कोई और नहीं भले मैला कुचेला काला नंगा आदिवासी ही क्यों ना हो ||
||हनुमंत किशोर ||

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