तलाक-तलाक-तलाक : कुछ सवाल
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तीन तलाक का सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला चल रहा है लेकिन इस बीच कई उच्च न्यायालयों ने से इसे बार-बार भेदभाव भरा कहकर एक प्रगतिशील हस्तक्षेप ऐसे मामले में किया है जिसे 'पर्सनल' बताकर कुछ कहने से जमात के बाहर के लोगों को रोका जाता रहा है |
दुनिया की सभी सत्ताएं चाहे वे धार्मिक हों या सांस्कृतिक स्त्री के सवालों से बहुत डरती हैं | कारण उसके सवालों से सत्ता के किले की सदियों पुरानी दीवार दरकने लगती है | ऐसा ही एक सवाल देहरादून की शायरा बानों ने कोर्ट में याचिका लगाकर पूछा है कि जब इस्लाम में निकाह मर्द और औरत की रजामंदी से होता है तब तलाक अकेले मर्द की मनमर्जी से कैसे हो सकता है ?
लेकिन इस दफे कोर्ट के दखल ने सियासी और मज़हबी हलके में भूचाल ला दिया | सरकार,विधि आयोग, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड , मीडिया सब मानो सोते से जाग उठे हैं और एक बार फिर से लैंगिक गैरबराबरी का मामला गरमा उठा है | जैसा कि रोज़ा लक्समबर्ग कहती हैं कि जब तक आप आगे नहीं बढ़ते लेते आपको जकड़ी हुई जंजीरों का अहसास नहीं होता | तो इस बार सायरा बानो जैसे ही आगे आईं उन पाबंदियों , परम्पराओं का असर दिखने लगा जिनकी बिला पर हर रूप में पितृ सत्ता अपना असर कायम करती है | जब तक औरत सब कुछ चुपचाप सहन करती रहती है,धर्म-समाज-संस्कृति में सब कुछ गुडी-गुडी दिखाई देता है लेकिन उसके सवाल उठाते ही सब बेहतर होने का यह तिलस्म दूटने लगता है | और चोतरफ़ा जो माहौल बनता है वो ऐसा होता है मानो किसी ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो |
तो इस दफे सायरा बानो ने जो सवाल उठाया है वह बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा ही है और अब नज़र क़ानून के सबसे बड़े पहरुए यानी सुप्रीम कोर्ट पर जा टिकी है | क़ानून के इस पहरुए को इस दफे भारतीय सम्विधान के अनुच्छेद १४ , १५, २१ और ४४ मद्देनज़र औरतों के हक़ बाबत फैसला करना है | बीएमएमए की सह-संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज़ कहती है, ‘तीन बार तलाक कहने से तलाक होने से बहुत सारी महिलाएं परेशान हैं. फोन पर तलाक हो रहे हैं, वॉट्सऐप पर हो रहे हैं और जुबानी तो हो ही रहे हैं. एक पल में महिला की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है. जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है और महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है. आप औरतों को कोई वस्तु नहीं समझ सकते. सोचिए ये सब 21वीं सदी में हो रहा है. हम इसके विस्तार में जायें इसके पहले सायरा बानो के मामले और तलाक ए बिद्दत के बारे में जान लेना लाजमी है |
पिछले साल अक्टूबर में शायरा बानो अपने माता पिता के इलाज के लिए देहरादून में थीं | उनके पति मो. अह्मद रिज़वान इलाहबाद में थे | शायरा बानो के उन्होंने फोन पर कहा तुम्हारे लिए जरूरी कागज़ात भेज रहा हूँ | शायरा को जब वे कागज़ मिले और उन्होंने खोलकर जब देखा तो उनके शादीशुदा रिश्ते का अंत हो चुका था | दो पन्ने के उस तलाकनामे में लिखा था “‘शरीयत की रोशनी में यह कहते हुए कि मैं तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, इस तरह तिहरा तलाक देते हुए मैं मुकिर आपको अपनी जैजियत से खारिज करता हूं. आज से आप और मेरे दरमियान बीवी और शौहर का रिश्ता खत्म. आज के बाद आप मेरे लिए हराम और मैं आपके लिए नामहरम हो चुका हूं.’
शायरा ने फोन पर रिजवान सम्पर्क करना चाहा तो फोन बंद मिला | रिश्ते को बचा पाने में नाकामयाब रहने की दशा में हारकर शायरा बानो को देश की सबसे बड़ी अदालत से दरयाफ्त करना पड़ा कि तीन बार तलाक बोलकर तलाक की व्यवस्था को गैर कानूनी घोषित किया जाये |उन्होंने साथ में तलाक से जुड़े “हलाला” और “बहुविवाह” को भी चुनौती दी |
इस पर आगे विचार करने के पहले एक बात और गौर करने लायक है कि असमान समाज में तकनीक जहां ताकतवर को और ताक़तवर बनाती है वहीँ कमज़ोर को और कमज़ोर बनाती है | यह बात फोन , मोबाईल, इंटरनेट, पर तलाक के चलन से साबित होती है | त्रिची तमिलनाडु की मरियम को तो उसके शौहर ने वाट्स एप पर ही तलाक दे दिया और इसे तिहरे तलाक की बिना पर जायज़ भी करार दे दिया गया | शायरा बानो की ही तरह काशीपुर की आफरीन की आप बीती भी जान लें जिसे शौहर ने स्पीडपोस्ट के जरिये तीन बार तलाक़ लिखकर तलाक दे दिया | आफरीन ने भी सर्वोच्च न्यायालय में इसके खिलाफ गुहार लगाईं है | उसके मामले में शौहर की शिकायत थी कि तुम अपने माँ –बाप का ज्यादा ख्याल रखती हो और मुझे शौहर होने का सुख नही दे सकती | हमारे समाज के पाखंड भी इसमें झलकता है कि एक ओर जहां लड़का श्रवण कुमार होने से प्रशंसनीय है वहीँ लड़की से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने माता पिता का ख्याल शौहर की मर्ज़ी से रखे |
मुस्लिम विधि जो शरिया कानून से शासित है में शादी एक करार है जिसमे दोनों पक्षों की रज़ा मंदी से अंजाम दिया जाता है |जो यौन सम्बन्ध और औलादों को जायज़ करार करने के लिहाज़ से जरुरी है | शादी के बाहर जिस्मानी रीलेशन वहां गुनाह है | शरिया जो पवित्र कुरान और हदीस के अनुसार बताया गया क़ानून है में शादी को खत्म करने के लिए तलाक की व्यवस्था दी है|
पवित्र कुरान की आयतों और इस्लामिक समाज के नियमों की अलग-अलग व्याख्या से चार संस्थाएं निकली जो क्रमश हनफिय्या, मलिकिय्या, शफिय्या और हनबलिय्या हैं मुस्लिम देशों ने अपने मुताबिक इन संस्थाओं के कानूनों को अपनाया। ये चार शाखाएं इस बात की गवाही भी देती हैं कि शरीयत में समय समय पर व्याख्या के चलते बदलाव होते रहे हैं | भारत में सन १९३७ में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट लाया गया जो जिसका मकसद इस्लाम के अनुयायियों के लिए मुस्लिम कोड बनाना था।यह अंग्रेजो की रणनीति थी कि हिंदुस्तानियों के ऊपर हुकूमत करने के लिए उनके प्रायवेट क़ानून और प्रथाओं को ना छेड़ा जाए | १९३७ के मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट के मुताबिक ही भारतीय मुस्लिमों के शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवादों के निपटारे होते हैं |एक्ट के मुताबिक व्यक्तिगत विवादों में सरकार दखल नहीं कर सकती।यह भारतीय सम्विधान के अनुच्छेद ४४ जो एक समान सिविल संहिता यानी यूनिफार्म सिविल कोड के विपरीत है | यहाँ यह भी जान लेना जरूरी है कि पर्सनल ला केवल केवल मुस्लिम ही नही अन्य धार्मिक मतावलम्बियों के लिए भी लागू है जैसे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम १९५६ जो हिंदू, बुद्ध, जैन और सिखों में उत्तराधिकार में मिली संपत्ति के विवादों को तय करता है साथ ही पारसी विवाह-तलाक एक्ट १९३६ और का हिंदू विवाह अधिनियम १९५५ का उदाहरण लिया जा सकता है |
मूल विषय पर फिर से लौटते है मुस्लिम विधि मोटे तौर पर तीन तरह के तलाक की व्यवस्था देती है ये हैं-
१)तलाक-ए-तफवीज: - इसमें मर्द शरीयत के अनुसार 90 दिन में तीन बार तलाक बोलकर अपनी बीवी से तलाक ले सकता है।इसमें एक बार तलाक बोलने के बाद अगली बार का तलाक बोलने के लिए एक निश्चित अंतराल होना चाहिये और उस दरम्यान बीबी और शौहर में कोई जिस्मानी रिश्ता कायम नही होना चाहिए | पूर्ण होने के पहले यह कभी भी वापस हो सकता है |
२)खुला: खुला के तहत बीबी शौहर के साथ न रह पाने की स्थिति खुला ले सकती है। इसकी पहल बीबी ही करती है।लेकिन बीबी के लिए शौहर की तरह आसान नहीं है |
३)फस्ख: फस्ख के तहत मियां-बीवी जब तलाक के लिए राजी हों, लेकिन दोनों में कोई असहमति हो तो वे शरई पंचायत कर सकते हैं। शरई पंचायत दोनों को सुनने के बाद अपना फैसला हालांकि शरई पंचायत के फैसले को मानने के लिए मजबूर नही किये जा सकते | आपसी रजामंदी से हुआ तलाक मुबरत कहलाता है |
इन तीनो से अलग तलाक ए बिद्द्त है यानी एक ही बार में शौहर द्वारा तीन बार तलाक बोलकर शादी के रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर देना | ये तीन तलाक कहीं कहीं एक ही तुहर में बोले जा सकते हैं यानी ‘मै तुम्हे तीन बार तलाक कहता हूँ’ | इतनी जल्दी तो आदमी साँस भी नहीं लेता जितनी जल्दी यहाँ मर्द एक रिश्ता खत्म कर सकता है वो भी ऐसा जिससे कई जिंदगियां बाबस्ता होती हैं | मन्नू भंडारी का “आपका बंटी “ याद आता है कि किस तरह माँ-बाप के फैसले की सजा मासूम बच्चा भोगता है | जिसका ना तो कोई गुनाह है ना ही फैसले में कोई हिस्सेदारी |
यहाँ एक बात ध्यान रखे जाने योग्य है कि दुनिया भर के २२ मुस्लिम देश अपने यहाँ क़ानून लाकर इसका नियमन कर चुके हैं | मिस्र १९२९ , सीरिया १९५३, पाकिस्तान १९६१ और बांग्लादेश १९७१ में इसके लिए क़ानून ला चुके हैं |
तलाक ए बिद्द्त पितृसत्ता यानी मर्दवाद की मिसाल है |अब्दुल्लाह बिस्मिल ने बुनकरों पर अपने चर्चित उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ में इसकी बानगी दी है | जहां मुस्लिम औरते जी-जान लगाकर मेहनत करने और आमदनी करने के बाद भी मर्द की तुलना में दोयम दर्जे की जिंदगी बसर करती हैं | इस उपन्यास का एक पात्र कहता है ,‘औरत की आखिर हैसियत ही क्या है? औरत का इस्तेमाल ही क्या है? चूल्हा-हांड़ी करे, साथ में सोये, बच्चे जने और पाँव दबाये। इनमें से किसी काम में कोई गड़बड़ की तो बोल देंगे तलाक, तलाक, तलाक।’
इस तिहरे तलाक को खुद इस्लाम में इसे अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता | बिद्द्त का शाब्दिक अर्थ ही है अनसमर्थित |
“एक साथ तीन तलाके देना शरियत इसलाम मे बहुत बड़ा गुनाह हैं,
एक बार मे तीन तलाके देने वाले को गुनाहगार ठहराने के बावजूद शरिअत ने उसे तलाक के और दो मौको से महरूम नही किया और तीन तलाक को एक तलाक ही मानती हैं|(स्रोत इस्लाम दि ट्रुथ) | मुस्लिम विद्वानों के अनुसार एक बार में तीन तलाक की व्यवस्था हजरत साहब की दी हुई नहीं है आपात स्थितियों में खलीफा उमर ने यह व्यवस्था दी थी | हज़रत उमर रज़ि0 ने लोगो को एक बार मे तीन तलाक देने से रोकने के लिये सज़ा के तौर पर तीन तलाक को तीन तलाक ही लागू कर दिया था लेकिन ये शरियत का मुस्तकिल कानून नही था| ये ठीक उसी तरह हैं के 5 वक्त की नमाज़ो को अगर किसी एक वक्त मे एक साथ पढ़ लिया जाये तो जिस वक्त मे नमाज़ पढ़ी जायेगी उस वक्त की नमाज़ तो हो जायेगी लेकिन दूसरे वक्तो की नमाज़ न मानी जायेगी क्योकि उनके अदा करने का वक्त बिल्कुल अलग हैं लिहाज़ा कोई इन्सान 5 वक्त की नमाज़ को किसी एक वक्त मे नही पढ़ सकता| ठीक यही मसला एक साथ तीन तलाक देने का हैं के अगर किसी ने एक साथ तीन तलाक दे दी पहली तलाक तो मान ली जायेगी लेकिन बाकि तो और तलाको के लिये इद्दत का वक्त गुज़ारना ज़रूरी हैं(स्रोत इस्लाम दि ट्रुथ )”
बाकी तलाक जहां तलाक ए सुन्ना यानी मान्य हैं वही तलाक ए बिद्द्त को आलिमो ने अमान्य विधि कहा है |
लेकिन दुर्भाग्य से एक ही बार में तीन तलाक कहकर तलाक देने का रिवाज़ बढ़ा है |और तो और नशे में भी तीन तलाक के मामले देखे गए हैं मिसाल के तौर पर ओडिशा में नगमा बीवी को उसके शौहर ने नशे की हालत में तलाक दे दिया था. सुबह उसे होश आया कि उसने गलती कर दी है. मगर उन दोनों को साथ रहने की इजाजत नहीं दीगई . और नगमा बीबी को निकाह हलाला के लिए भेज दिया गया | यहाँ पर हलाला की चर्चा लाजमी है जिसे भी शायरा बानो के मामले में उठाया गया है | हलाला एक व्यवस्था है जिसके तहत यदि तलाक शुदा मिया बीबी फिर से एक होना चाहे तो बीबी को किसी और से निकाह करना होता है जहाँ से उसे तलाक होने पर वह फिर से पुराने मर्द से शादी रचा सकती है |
तलाक अच्छा है या बुरा इससे पहले यह सवाल जायज हो जाता है कि क्या तलाक औरत के हक में होता है ? क्या वह उस हालत में होती है कि खुद की और अपने बच्चे की परवरिश कर सके | हमारे समाज में जहाँ एक औरत शादी के बाद शादीशुदा जिंदगी के लिए अपना कैरियर तक दांव पर लगा देती है | पति,बच्चों,परिवार और घर को ही अपना कैरियर मान लेती है वहां तलाक के साथ ही वो एक दम से बेघर और बेसहारा हो जाती है | जिसके पास अपनी जीविका के लिए कोई साधन नहीं होता | इसीलिए शायरा बानो का मामला सम्विधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत आता है जो देश के हर नागरिक को प्राण एवं देह की स्वतन्त्रता की गारंटी देता है इसे जीने का अधिकार भी कहा जाता है | जीविका विहीन , जीवन की सुरक्षा से वंचित तलाकशुदा औरत जीने के अधिकार का कैसे उपभोग कर सकती है | भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सह-संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज़ कहती है, ‘तीन बार तलाक कहने से तलाक होने से बहुत सारी महिलाएं परेशान हैं...... एक पल में महिला की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है. जुबानी तलाक एक गलत प्रथा है और महिलाओं के सम्मान के लिए इसे खत्म करना जरूरी है. आप औरतों को कोई वस्तु नहीं समझ सकते. सोचिए ये सब 21वीं सदी में हो रहा है. |”
मरहूम शाइरा परवीन शाकिर ने इस दर्दो बेबसी को एक शेर में कुछ यूं बयान किया है –
“तलाक दे तो रहे हो नाज़ोगुरुर के साथ
मेरा शवाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ |”
इस पूरी डिबेट में एक बात और कचोटने लायक है कि जहां केंद्र सरकार और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आमने सामने हैं और अपनी अपनी तरह से दांव खेल रहे हैं | वहां उस औरत का मन और फैसला अलग थलग पड़ा हुआ है जिसके वजूद से यह बहस सीधे बाबस्ता है |
भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने पूरे देश में ४७१० महिलाओं का सर्वे कर उनसे सवाल पूछा |
इनमे ५३.२% घरेलू हिंसा की शिकार थीं |( ३ बच्चो की माँ ३५ वर्षीय शायरा बानो के मामले को देखे तो उसने भी एक पत्रकार को बताया कि उसका ६ बार एबार्शन हुआ | या कहें किया गया )
५२५ तलाक शुदा महिलाओं के में ६५.९%को जुबानी तलाक मिला था |
७८% को एक तरफ़ा तलाक मिला था |
औरतो को तलाक पर मिलने वाला मुआवजा यानी मेहर ४०% औरतों के मामले में १ हज़ार से भी कम था और ४४% ने तो इस मेहर की रकम के ना मिलने की बात भी कही |(यह इस दावे की कलई खोलता है कि मेहर तलाक की दशा में पर्याप्त सुरक्षा है )
लेकिन इन सबमे इस सर्वे की सबसे बड़ी बात यह है कि ८८.३ % औरते चाहती हैं कि तलाक को लेकर कानूनन सही तरीका हो यानी ९० दिनों की प्रक्रिया हो इस बीच बातचीत हो बड़े बुजर्गो की मध्स्थता हो | ८३.३% ने यह भी चाहा कि सरकार इस दिशा में क़ानून बनाये |
अब देखना यह है कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड , केंद्र सरकार और दूसरे ज़िम्मेदार इस आवाज़ को कितना सुनते हैं |उसे नयी रौशनी से अब और मरहूम नही किया जा सकता |
वैसे यदि सब चाहते हों कि औरत उनकी सुनती रहे तो अब इसे अनसुना करना लाजमी नही होगा |
|| हनुमंत किशोर ||
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