Tuesday, March 4, 2025

हमारे समय में स्त्री.. चार कविताएं

 हमारे समय में स्त्री :तीन कविताएं .

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1)

एक 

थकी हुई सुबह

एक 

ऊबी उदास दोपहर 

एक 

लिथड़ी हुई सांझ

एक

टूटकर बिखरी रात

कविता में

ना सुनना चाहे तो

सीधे-सीधे कहूँ

" हमारे घरों की औरतों .."

2)

गांधारी होने के लिए 

आंखों पर पट्टी बांधना ही जरूरी नहीं था 

खुली आंखों से भी गांधारी हुआ जा सकता था 

ये मै अपनी मां को देखकर समझ सकता था 

गांधारी का ये रूप 

ज्यादा बेचारगी भरा था ..


3)

 पाँव

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जानेमन 

तुम्हारे पाँव बहुत खूबसूरत हैं

मखमली संगमरमर पर नही

तुम रखती हो इन्हे खुरदुरी पथरीली ज़मीन पर


तुम्हारे चेहरे से नहीं

तुम्हारे पाँवो से खुलते हैं

तुम्हारी ज़िंदगी के राज़

जब कभी ज़िंदगी पे प्यार आता है

तुम्हारे पाँवो को चूमने का जी होता है बहुत


.इन्हे देखकर ही समझ आता है कि

क्यों समय की शिला पर चेहरे नही,पाँव दर्ज़ होते हैं ?

और कैसे कुछ चेहरों की कागज़ी खूबसूरती के लिये

 बेहद बदसूरत होना पड़ता है कई कई पाँवों को ?


तुम्हारे पांवों से मिलती हैं मौसम की सब निशानदेही 

जैसे बिवाइयों की दरारों में छिपा होता है ठिठुरता माघ

और अँगुलियों के बीच ग़लती चमड़ी

गवाही देती है रसोई में घुसे बारिश के पानी की.. 

फूटते हैं जब पाँवों के छाले तो ठंडा जाती हैं

जेठ में धरती की तवे सी तपती पीठ ..


तुम्हारे पाँव असमाप्त कविताएँ हैं

जो संघर्ष के एक सिरे से 

संघर्ष के दूसरे सिरे तक अविराम फैली हैं

तुम्हारे पाँवो के जरिये कुदरत मौत का विलोम रचती है ....


मज़ाक में न लो इसे तो कहूँ

ज़िंदगी पे जब भी प्यार आता है

तुम्हारे पांवों को 

चूमने को जी होता है बहुत..


4)

आठ मार्च

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सात मार्च की ही तरह आया आठ मार्च ..

आज  के दिन भी 

‘ वे’ पौ फटने के पहले उठीं

बच्चों को स्कूल के लिए तैयार किया

पति को बिस्तर पर चाय दी

और घर के सब काम निपटाकर 

अपने काम पर निकल गयीं

फिर काम से लौटी और काम पर लग गयीं ..

आज के दिन भी ‘वे’ कोचिंग से आकर सीधे किचन में घुसीं

उधर भइया सौफे पर किताबे फेककर दोस्तों से मिलने निकल गया ..

आज भी ‘वे’ आफिस, स्कूल, बाज़ार में अजीब तरह से घूरी गयीं

और निगाह बचाकर तेज़ी से निकल गयी ..

आज के दिन भी वे दान की वस्तु समझा गयीं

और खानदान के सम्मान के लिये तहखानो में डाल दी गयीं |

आज के दिन भी उनका गर्भ में ही आखेट किया गया |

आज के दिन भी उन्होंने पति की झूठी थाली में ‘पुण्य’ की तरह खाया

और पति की लात को 'प्रसाद' समझकर चुप हो गयीं ..


जब कभी उनके हलक से आवाज निकली 

उनकी बेड़ियों को खोलकर

उनके गले में हार की तरह डाल दिया  गया

और वे चौराहों पर पूज्य प्रतिमाओं की  तरह स्थापित कर दी गयीं ..


इस आठ मार्च  की चुसनी की जगह ,

उन्हें संतरे की गोली दे दो

कम से कम उनका स्वाद तो बदल जायेगा ..

*हनुमंत किशोर*