देवस्थान में औरत वाया सबरीमाला /शनि सिग्नापुर
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लिखने कुछ और बैठा था लेकिन लिखने कुछ और जा रहा हूँ |
लिखना शुरू किया ही था कि पड़ोसन ने दरवाजे पर दस्तक देकर छोटी बिटिया के बारे में पूछा वे उसे कन्या भोज के लिए न्यौता देने आयी थीं |
मेरी बड़ी बिटिया को इन दिनों कोई कन्या भोज के लिए नहीं बुलाता | शुरू शुरू में उसे इसे लेकर बड़ा दुःख भी हुआ लेकिन अब इसमें उसे सहज नियति मानकर स्वीकार कर लिया है | लेकिन पहली बार जब वो ऐसी ही नव रात्रि में एक कन्या भोज से लौटकर आई थी उसकी आँखे भरी थी और होंठ रह-रहकर फड़क रहे थे | पूछने पर पता चला कि आंटी ने पहले तो उसे सबके साथ बैठाया फिर उसे उठकार अलग से ‘महीने के उन दिनों’ के बारे में पूछा | फिर उसे छोटी बहन की पंगत से अलग बैठा दिया | बड़ी बिटिया को गुस्सा इस बात पर था कि इसमें उसकी गलती क्या है और दुख इस बात पर कि अब उसे कन्या नहीं समझा जाता |जबकि वो तो अभी बच्ची ही है ..सिर्फ तनिक बड़ी |
उस दिन मुझे भी लगा कि ‘कन्या-भोज’ के पीछे समाज की सोच में कहीं कुछ टेढ़ापन पन है | ऐसी धारणाएं स्त्री और स्त्री के बीच विभेद के अलावा स्त्री के स्त्री होने को भी छुआछूत का विषय बना देती हैं | नवरात्रि या नव दुर्गा शक्ति की उपासना का धार्मिक पर्व है और दूसरे धार्मिक पर्वो की तरह इसके भी अपने सांस्कृतिक मूल्य हैं और यह एक तरह से वर्चस्व की सत्ता को बनाये रखने के लिए सामाजिक सांस्कृतिक अनुकूलन का साधन बन जाता है | ‘मार्कन्डेय-पुराण’ जिसकी देवी स्तुति इस पर्व का आधार है देवी या शक्ति को प्रकृति के विविध रूपों में न्यस्त करती है और उसे प्रणाम करती है | उसकी ‘जगत-जननी’ ‘जगदम्बा’ कहकर स्तुति करती है | यहाँ किसी तरह का कोई विभेद नहीं मिलता | लेकिन इस पर्व से जुड़े लोकाचार में स्थिति बदल जाती है | जब कोई कन्या एक अपरिहार्य जैविक-प्राकृतिक प्रक्रिया के चलते रजस्वला होते ही यानी सम्पूर्ण स्त्री बनने पर और जननी बनने की अहर्ता अर्जित करने पर जहाँ श्रेष्ठतर होनी चाहिए वहां वह इन लोकाचारो में हीनतर बना दी जाती है |
इसके मूल में उन पितृसत्तात्मक मूल्यों का खेल दिखाई देता है जो धर्म का अपने पक्ष में निर्वचन और नियमन करते आये हैं | अपने वजूद के विस्तार और संरक्षण के लिए या विकास के किसी सोपान पर सामन्जस्य बैठाने के लिए वे मातृसत्तात्मक भले हो जायें, अंत में अपने मूल चरित्र का प्रकटन करते ही हैं | शक्ति की उपासना पर्व में ‘कन्या-भोज’ में कन्या और स्त्री का विभेद उसी का परिणाम है |
लोक जीवन में माँ पूज्य जहाँ है और कई अवसरों पर जिसे परमेश्वर से ऊपर भी कहा जाता है वहां स्त्री को माँ बनने की योग्यता हासिल होते ही इन अवसरों के लिए अयोग्य निरुपित कर देना पितृसत्तात्मक मूल्यों द्वारा धर्म और संस्कृति के माध्यम से अपने पक्ष में स्थापना तैयार करने का संकेत देता है | यही स्त्री विरोधी धारणा रजस्वला होने पर स्त्री को ‘अपवित्र’ ‘हीन’ ‘शक्तिच्युत’ घोषित कर देती हैं |
इसकी पराकाष्ठा और सिद्धांतकी तब दिखाई देती है जब देवताओं को जन्म देने वाली स्त्री को ही देवस्थान में प्रवेश करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है | यद्यपि हमारे समाज के बहुस्तरीय और बहु सांस्कृतिक होने से इसका विलोम भी उपस्थित दिखाई देता है जैसे केरल में भगवती मन्दिर में पूरा गाँव जुटकर रजस्वला होने को उत्सव रूप में मनाता है | उस समय के वस्त्र को मंगल वस्त्र मानकर स्पर्श किया जाता है |असम के कामरूप कामाख्या मन्दिर में भगवती की उसी ‘अंग’ की पूजा की मान्यता है | लेकिन ये सभी उदाहरण प्रतिसंस्कृति की क्षीण धारा है, मूल धारा नहीं जो अपने चरित्र में पितृ सत्तात्मक और स्त्री लिंग के प्रति विभेदकारी है | इसे शनि सिंगानापुर, सबरीमाला माला , हाजी अली की दरगाह में स्त्री के प्रवेशके अधिकार को लेकर हुए आन्दोलन के जरिये समझा जा सकता है |
रजो धर्म और अपवित्रता की इस अवधारणा को स्पष्ट करने में मेरे अपने व्यक्तिगत अनुभव मुझे बराबर सता रहे हैं |
बात बचपन से शुरू करता हूँ | तब जब हमारा परिवार पिपरिया में था | मै कोई आठ दस बरस का रहा होउंगा | तब मां महीने के चार-पांच दिन मुझसे दो काम कहने के लिए करती थी पहली भगवान की पूजा और दूसरी पापा के लिए रसोई तैयार करना | वे सब कुछ तैयार करके दे देती थीं मुझे बस उसे चूल्हे पर चढ़ाना होता था | हमारे लिए रसोई वे ही तैयार करती थी | उस वक्त मैंने यह समझने या पूछने की कोशिश नही की कि ऐसा क्या है जो तुम भगवान को नहीं नहीं नहला धुला सकतीं और पापा तुम्हारे हाथ का पकाया क्यों नही खा सकते ? तब परिवार में दादी का युग का था बाद में घर के भीतर जब माँ की पकड़ थोड़ी बहुत मजबूत हुई तब मैंने देखा कि बहन या बहू को महीने के इन विशेष दिनों में रसोई या पूजा घर से दूर रहने की बंदिश नहीं रही | लेकिन आज भी कुलदेवता या धार्मिक पूजा में जब कोई स्त्री कटी-कटी सी दिखती है तो साफ़ समझ में आता है कि वो ‘माह के इन दिनों’ से है |
जब कभी कोई ‘माह के इन दिनों’ के निषेध को ‘माह के इन दिनों’ में स्त्री के स्वास्थ्य और आराम की आवश्यकता से जोड़कर न्याय संगत और तर्क संगत ठहराने की चेष्टा करता है तो उससे यह स्वाभाविक प्रश्न करने का मन करता है कि ‘माह के इन दिनों’ में स्त्री को झाडू-पोछा-कपड़े –बर्तन से क्यों राहत नहीं दी जाती सिर्फ भगवान या रसोई को छूने से रोककर स्त्री को कौन सा आराम दिया जाता है ?
शायद इस बीच ज़माना और जरूरते बहुत कुछ बदल चुकी है और एक जैविक प्रक्रिया को अभिशाप की तरह देखना बदल चुका है लेकिन आज भी कुछ मध्ययुगीन मष्तिष्क इन निषेधों और अपवित्रता की धारणा को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करते हैं तब वे पितृसत्तात्मक मूल्यों के वही पैरवीकर्ता होते हैं जो आज भी कुछ देवस्थानो में स्त्री के प्रवेश सम्बन्धी निषेध को देवीय आदेश से जोड़ता हैं | इस दकियानूस मानसिकता के विरुद्ध सभ्य और प्रगतिशील समाज में आवाश्यक आलोचनात्मक विवेक विकसित करने की आवश्यकता है |
त्रेता में स्त्री का उद्धार भले भगवान श्री राम ने किया हो या द्वापर में उसके उद्धार के लिए भले भगवन श्री कृष्ण आगे आये हों ...आज के समय में स्त्री के उद्धार के लिए कोई अवतार अवतरित होता नहीं दिखता | अब यह काम स्त्री-अधिकार की पैरोकार जनवादी प्रगतिशील शक्तियाँ ही करती दिखाई दे रही हैं | तृप्ति देसाई की भू माता ब्रिगेड और नूरजहां साफिया नियाज़ के भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की कोशिशों को इसी रूप में देखा जाना चाहिए | जिनकी कोशिशों को संवैधानिक शक्ति देने का काम देश की न्यायालयों ने करके स्त्री उद्धार के एक ‘अवतार’ की छवि अर्जित की है देवस्थान में लिंग विभेद का मुद्दा सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं एक सांस्कृतिक मुद्दा होकर मनुष्य जाति की बराबरी का एक वृहत मुद्दा है | केरल में सबरीमाला मंदिर में १० वर्ष से लेकर पचास वर्ष तक की महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है जिसे स्त्री के रजोधर्म के कारण उसकी अपवित्रता से जोड़ा जाता है | इस निषेध के विरुद्ध यंग लायर्स एसोशिएशन ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की | इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने मन्दिर का प्रबन्धन कर रहे त्रावनकोर देवाश्र्म बोर्ड से पूछा था कि यदि रजोधर्म स्त्री के अपवित्रता की कसौटी है तो पुरुष की पवित्रता की कसौटी क्या हैं ?
स्त्री के देवस्थान में प्रवेश पर २६ अगस्त को बाम्बे हाई कोर्टने एक बड़ा फैसला हाजी अली दरगाह के मामले में दिया | इस दरगाह में श्राइन बोर्ड द्वारा वर्ष २०११ में स्त्री के प्रवेश को सीमित कर दिया गया था | नूरजहां साफिया नियाज़ के भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने जब इस सवाल को उठाकर कानूनी लड़ाई लड़ी तो दरगाह के प्रबन्धन ने स्त्री के प्रवेश को महापाप तक निरुपित किया तब भी प्रवेश के अधिकार की मांग करने वाली बीबी खातून में भी कुछ इसी तरह से सवाल किया था कि क्या सूफी-संत औरत की कोख से नहीं जन्मे ?बाम्बे हाई कोर्ट के फैसले को यद्यपि सुप्रीम कोर्ट में दरगाह बोर्ड में चुनौती दी हुई हैं |
मीडिया कवरेज और भू माता ब्रिगेड के आन्दोलन के कारण इस विषय पर सबसे अधिक चर्चा में शनि सिगानापुर के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला रहा | जिसमें ३० मार्च को बाम्बे हाई कोर्ट के फैसले ने देवस्थान में लिंग भेद को करारा झटका दिया | शनि सिगनापुर देश में शनि देव का सबसे प्रमुख मन्दिर है जिसके चबूतरे पर स्त्री का प्रवेश लगभग ४०० साल से निषिद्ध था | जहां पुरुष चबूतरे पर जाकर शनिदेव की प्रतिमा पर तेल चढा सकते थे वहीँ महिलायें केवल दूर से दर्शन कर सकती थीं | तृप्ति देसाई की भू माता ब्रिगेड ने यहाँ महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक आन्दोलन चलाया जिसे अंतिम सफलता इस फैसले से मिली | इस फैसले के बाद महिलायें चबूतरे तक पहुंची और शनि की प्रतिमा से जुड़े कर्मकांड उसी तरह से विधिवत पूरे किये जिस तरह से अब तक सिर्फ पुरुष करते आये थे |इस बीच मीडिया में एक शंकराचार्य स्वारुपानन्द का वह विवादित बयान भी चर्चा में आया जिसमे उन्होंने इस घटना के बाद महिलाओं पर बलात्कार के मामले बढ़ेंगे, कुछ ऐसी भी बात कही | इससे जाहिर है धार्मिक सत्ता का एक बड़ा वर्ग धर्म में अपनी इजारेदारी कम होने से हताश हुआ है |लेकिन एक टिप्पणी मुझे नहीं भूलती जो मेरे कार्यालय की साधारण महिला कर्मचारी ने की थी | उसने कहा था कि शनि देव यदि हमारे छूने से अपवित्र हो जाते हैं तो फिर हमारी कुंडली में क्यों बैठे हैं ? मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था क्योंकि शनि के बारे में मुझे इतना ही पता था कि वो हमारी पृथ्वी की तरह सूर्य का चक्कर लगाने वाला एक ग्रह है |और चूंकि वहां जीवन नहीं है इसलिए उसमे आगे मेरी कोई दिलचस्पी पैदा नहीं हो सकी |वैसे मुझे लगता है कि आगे के सब कहानियां धंधे और ताकत को बनाये रखने के लिए होशियार लोगों द्वारा गढ़ी गयी हैं | वे मुझे रोचक भले लगें तार्किक नहीं लगतीं |
सबरीमाला , हाजी अली दरगाह, शनि सिगनापुर की लड़ाई प्रतीकात्मक है | वह धर्म की पितृ सत्तात्मकता को चुनौती देती हुई धर्म में स्त्री की बराबरी के सवाल को सामने लाती हैं | उपासना हर व्यक्ति का मानव अधिकार है जिसे हमारे सम्विधान में अनुच्छेद २५ और २६ के अंतर्गत मूल अधिकार के रूप में संरक्षित किया गया है | धार्मिक पूजास्थल में लिंग के आधार पर महिलाओं से भेदभाव उतना ही निंदनीय,मनुष्य विरोधी और असंवैधानिक है जितना धार्मिक स्थल में छुआछूत और जातिगत भेदभाव |
जैसा कहा यह लड़ाई प्रतीकात्मक अधिक है | इसमें जीतेने का अर्थ यह नहीं है कि सब कुछ बदल जाएगा | देवास्थान में स्त्री की बराबरी के साथ उन धार्मिक मिथकों ,प्रत्ययों को समझने की आवश्यकता है जो स्त्री –पुरुष के मध्य विभेद्मूलक अवस्थिति को धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता प्रदान करते हैं|
मुझे यह सवाल बड़ा बैचेन करता है कि ईश्वर पुरुष है या स्त्री ?यदि दोनों से परे है तो हमेशा पुरुष के रूप में ही क्यों याद किया जाता है | ईसाइयत में तो वह सीधे-सीधे पिता है | जो परम पिता होकर पिता की ही तरह अपने बच्चों को सही सही-गलत व्यवहार के लिए दंडित-पुरुस्कृत करता है |
क्यों आदम की पसलियों से हव्वा का निर्माण किया गया ?
आज तक सारे मैसेंजर सारे शंकराचार्य सारे पोप पुरुष ही क्यों हुए ?
जाहिर है धर्म का क्षेत्र अब तक पुरुषों का क्षेत्र रहा है |
लेकिन इतिहास सदा एक ही करवट नहीं सोता
वह करवट बदलता भी है |
भूकम्प भी आते हैं,टूट-फूट भी होती है |
शुरुआत हो चुकी है ..
देखिये आगे क्या होता है ...
उस दिन का इंतज़ार रहेगा जब ईश्वर की बनायी हर शै उसके दरबार में और हर जगह बराबरी पर होगी ..|
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पुनश्च :
हे ईश्वर ,
तूने संसार बनाया
फिर संसार को चलाने के लिए
हमें बनाया
प्रकृति को तूने ऋतू चक्र दिया
और हमे मासिक चक्र ..
अब तू ही इन नादानों को समझा
कि उर्वर होने से
ना धरती अपवित्र होती है
ना हम औरतें ...
अपने देवताओं से कह
कि वे गवाही दें
इस बात की
कि जिस कोख से वे जन्मे हैं
उसकी छूत नहीं लगती ....
हे ईश्वर
अब तू ही समझा इन मूर्खो को
कि
पवित्र पंचमहाभूत से बनी यह काया
सदा ही पवित्र है
अपवित्र तो वो हृदय है
जो सबमे तुझे देख नही सकता .....
||हनुमंत किशोर||
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