14सितम्बर के बहाने हिंदी का हाल और सवाल
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१४ सितम्बर को राजभाषा दिवस के सरकारी पर्व पर एक कर्म काण्ड की तरह हिंदी को याद किया जायेगा और राजभाषा बनाते समय जो असली उद्देश्य था उसे भुला दिया जाएगा ताकि अंग्रेजी के नाम पर १५ बरस का जो पट्टा पहली बार लिखा गया था वो आगे के लिए जारी रहा आये | राजभाषा अधिनियम के समय जो बहस हुई थी उसके केंद्र में हिंदी को देश की अस्मिता और आजादी के आन्दोलन से उपजे राष्ट्रीय मूल्यों की संरक्षिका बतौर देखा गया था | हिंदी ने आज़ादी के आन्दोलन में विदेशी हुकूमत ही नही विदेशी संस्कृति की प्रतिरोधी शक्ति के रूप में वृहत्तर भूमिका अदा की थी | उसने एक साथ प्रयोजनमूलक ,ज्ञान मूलक और संस्कृति मूलक दिशाओं को साधा था | वह आक्रान्ता संस्कृति के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी हुई | अंग्रेजो की जो संस्कृति और मूल्य भारतीय जीवन पद्धति को बदल रहे थे ,हिंदी उसके प्रतिरोध को रच रही थी | प्रसाद और निराला का साहित्य पुनर्जागरण और विस्मृत गौरव को सामने ला रहा था | उस दौर में हिंदी खादी और चरखे के साथ बड़ी हुई थी | भारतीय आज़ादी के आन्दोलन में हिंदी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन नहीं बल्कि अस्मिता भी है | समाज की स्मृति और स्वप्न की वाहिका भी है | तब हिंदी ही थी जो देश को जोडती थी जिस शक्ति को पहचानकर गांधी ने १९१८में इंदौर के हिंदी सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए ज़ोरदार शब्दों में कहा था “हिंदी ही भारत को एकता के सूत्र में पिरोने का काम कर सकती है |” १९४७ में देश को आज़ादी मिलने पर जब बीबीसी ने उनका इंटरव्यू करना चाहा तो उन्ही गांधी ने कहा “ दुनिया को यह बता दो कि गांधी को अंग्रेजी नहीं आती “ यह गांधी का हिंदी के प्रति पूर्ण समर्पण था | वे दक्षिण के भाषा भेद को भी समझ रहे थे और उसे लक्ष्य कर उन्होंने दक्षिण में देवदास गांधी को हिंदी के प्रचार के लिए भेजा | गांधी ने लिपि की समस्या को भी तब पहचान लिया और सुझाव दिया था कि दीगर भाषाये भी देवनागरी में लिखी जायें | गांधी के साथ उस दौर में प्रेमचंद जैसे साहित्यकार भी घूम-घूम कर हिंदी का प्रचार कर रहे थे | दक्षिण में हिंदी सम्मेलन करने की प्रेमचन्द की लालसा का पता उनके पत्रों से भी मिलता है | इसी अभियान का असर था कि १९३५ में सी राजगोपालाचारी ने हिंदी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था और इसके भी पहले १९०६ में सुब्रमन्यम भारती ने हिंदी सीखने की अपील कर चुके थे | गांधी या राजगोपालचारी जैसे थोड़े ही गैर हिंदी से आये लोग नहीं थे जो हिंदी के प्रति ये विचार रखते थे मराठी भाषी तिलक भी खुलकर हिंदी के पैरोकार थे |ज़रा और पीछे देखे तो १८७२ में बांग्ला भाषी केशव चन्द्र सेन में गुजराती मातृ भाषी दयानन्द सरस्वती को सलाह देते हुए कहा था कि संस्कृत छोड़कर हिंदी में बोलो और दयानन्द सरस्वती इस सलाह से इतने प्रभावित हुए कि आर्य समाज का मूल ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ उन्होंने हिंदी में रचा | उन्ही केशव चन्द्र सेन के कलकत्ते से हिंदी का पहला अखबार ‘उद्दंत मार्तण्ड’ प्रकाशित हुआ और कलकत्ते के ही फोर्ट विलियम कालेज में जॉन गिलक्रिस्ट की प्रेरणा से १८२० में लल्लू लाल ने हिंदी की पहली गद्य पुस्तक ‘प्रेम सागर’ रची | हाँ इसमें अंग्रेज की नीयत हिंदी के प्रचार की नहीं बल्कि प्रशासन करने के लिए हिंदी मानस से सम्वाद करने हेतु उसकी भाषा सीखनी थी | हालांकि यह बहस का विषय है कि राजभाषा बनने के बाद हिंदी इन दीगर भाषाओं का कितना ऋण उतार सकी और उसे इस स्थिति में लाने के लिए ज़िम्मेदार कौन थे?
त्रिभाषा फार्मूले को ही लीजिये मै स्वयम को इसका शिकार मानता हूँ | त्रिभाषा फार्मूले के तहत उत्तर भारत के राज्यों में प्रचलन बाह्य संस्कृत को बंगाली पंजाबी तमिल मराठी जैसी जीवित भाषाओं पर तरजीह दी गयी और गैर हिंदी का ऋण उतारने था गैर हिंदी का विश्वास जीतने का मौका खो दिया वर्ना आज हिंदी के प्रभुत्व के प्रति जो नकारात्मक प्रतिक्रिया दक्षिण या पश्चिम में दिखाई देती है उसका परिदृश्य शायद और होता | राजभाषाई हिंदी को लेकर हुई इस अदूर्न्देशी ने सिर्फ दक्षिण भारत की भाषाओं को आहत नहीं किया हिंदी पट्टी की बोलियों को भी जख्म दिये जहाँ वे मानक हिंदी की तानाशाही में बिसार दी गईं और बहिष्कृत कर दी गईं | जिस पीड़ा में कभी धूमिल ने लिखा था “तुम्हारा यह तमिल दुख / मेरी भोजपुरी पीड़ा का भाई है / भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे का कौर है |” इसी भाषाई असम्वेदनशीलता के कारण देश को एक नहीं अनेक बार भाषाई दंगे झेलने पड़े | जिनके समाधान में ही धूमिल ने भारत माता की कल्पना उस रूप में की होगी जहाँ वो १४ मुखों से बोलती हुई आ रही है |
जहां तक राज भाषा बनने के बाद की स्थिति का प्रश्न है उसका भी कोई खास सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिलता | उसकी वजह हिंदी के नीति नियंताओ की अदूरदर्शिता या एक कोण से उनका षड्यंत्र ही कहा जाएगा | मिसाल के तौर पर अदालतों में काम काज को ही लें | उपरी अदालतों में तो आज भी अंग्रेजी का प्रभुत्व है लेकिन हिंदी पट्टी में निचली अदालतों में कामकाज की भाषा हिंदी है | किसी जमाने में ये फारसी और उर्दू हुआ करती थी तब यह कहकर हिंदी की पैरवी की गयी थी कि हिंदी जनता की भाषा है और निचली अदालत में काम जनता की भाषा में होना चाहिये | इस विचार का समर्थन करते हुए निचली अदालतों के लिए हिंदी को उर्दू की जगह दे दी गई |
लेकिन जिस हिंदी ने वहां स्थान लिया वो जनता के लिए उतनी ही अपरिचित रही आई जितनी कोई पराई भाषा | आज भी गवाह यह सुनकर बगले झाँकने लगता है जब उसे बताया जाता है आप साक्ष्य के लिए आहूत हैं | वकील जैसे सीधे साधे प्रचलित शब्द के स्थान पर अधिवक्ता कहते ही सामान्य जन की हालात देखने लायक होती है |
एक अदालत ही नहीं जहाँ-जहाँ मानक हिंदी को लागू किया गया वहां यही हालात हैं |
आये दिन सडक पर बोर्ड पर टंगा मिलता है ...कार्य प्रगति पर है जो वर्क इन प्रोग्रेस का अनुवाद है | इसकी जगह काम चालू है लिखना शायद ज्यादा आसानी भरा हो | ‘ठंडा पानी’ को पोतकर ‘शीतल जल’ , अन्दर और बाहर के लिए आगम और निर्गम , ‘पैसेंजर’ के स्थान पर ‘यात्रीगाड़ी’ का प्रयोग किसके पक्ष में है यह सवाल बेकार नहीं है | मानक हिंदी के नाम पर अंग्रेजी का फूहड़ अनुवाद कर या तत्सम शब्दावली गढ़ कर जिस तरह से भाषा लगातार कृत्रिम बनाते हुए जनता से दूर किया गया वो सिर्फ अदूरदर्शिता थी या षड्यंत्र यह तय करने का काम आपका है | हाँ इसे तय करते समय राम मनोहर लोहिया की एक बात ज़रूर याद रखियेगा जो वो उन्होंने देश में द्विज की परिभाषा को लेकर कही थी लोहिया कहते थे सम्पत्ति , जाति और अंग्रेजी इन तीन में दो जिसके पास है वो द्विज है | तो जब राजभाषा अधिनियम ने अंग्रेजी की तानाशाही एक हद तक समाप्त करनी चाही तो देश में सत्ता के शीर्ष पर आसन जमाये द्विजो ने हिंदी को ही इस तरह कृत्रिम दुरूह बना दिया कि वो आम आदमी की पहुँच से उतनी ही दूर रही आई जितनी अंग्रेजी | आम बोल चाल के , रूपांतरित होकर हिंदी के हो चुके विदेशी शब्दों को खींच-खीच कर बाहर निकाला गया और संस्कृत निष्ठ शब्द ठूंस ठांस दिये गये | तत्सम शब्दों से उसका श्रंगार नहीं किया गया बल्कि उसे जंजीर में जकड दिया गया कि उसकी सहज चाल कुंठित हो गयी और वो वास्तविक सौन्दर्य खोकर किताबी बनकर रह गयी | और यह सब शुद्धता और मानक के पवित्र झंडे तले किया गया | भाषा का शुद्धता वादी आग्रह उपरी तौर पर भाषा का हितैषी भले जान पड़े होता वह भाषा का शत्रु ही है | भाषा किसी अनुवाद की प्रयोगशाला या विश्वविद्यालय के सभागार में नहीं बनती वह तो समाज और जीवन से ही अपनी उर्वरता लेती है | वही बनती और बिगडती है | जिसे अशुद्धता या मिलावट कहा जाता है वह उसका चरित्र है उसके विकास की शर्त है | भाषा का चरित्र बड़ा विनिमय शील होता है | वो दूसरी भाषा से लेते चलती है और दूसरी भाषा को देते चलती है | जो भाषा इस लेनदेन में कंजूसी करती है उसका क्षरण होने लगता है और वह इतिहास में दर्ज हो जाती है| इस तरह से भाषा एक सामाजिक उत्पाद है और वह कभी अंतिम नहीं होती | परिवर्तन शील होती है | हिंदी इस मामले में बड़ी सम्पन्न भाषा रही है उसका हाजमा ऐसा रहा कि हर दिशा से उसने ग्रहण किया और पचाकर रक्त मज्जा में बदल लिया |इसलिए जो अपने राजनैतिक सांस्कृतिक एजेंडे के तहत भाषा की के शुद्धिकरण की बात करते हैं वे उसका वही हश्र करना चाहते है जो व्याकरण में जकड़ी संस्कृत का हुआ | इसकी तासीर का दीदार अमीर खुसरो की जिहाले मिसकी मुकुन तगाफुल नुमा शायरी में होता है जहाँ फ़ारसी और हिन्दवी गलबहियाँ डालकर आगे बढ़ते है | आज हिंदी में अरबी फ़ारसी पुर्तगाली अंग्रेजी के शब्द इस कदर जज्ब हो चुके है कि उनकी पहचान मुश्किल हैं |
यहाँ यह साफ़ कर देना जरूरी है यह निर्विवाद है कि ज्ञान के अनुशासन की भाषा आम भाषा से भिन्न होगी | यहाँ उस हिंदी की बात है जो कामकाज की हिंदी के नाम पर थोपी गयी है | यह वो हिंदी बेशक नहीं है जिसके लिए गांधी के नेतृत्व में संघर्ष किया गया था | जिसकी मानवो के महा सागर में एक सूत्र की तरह कल्पना की गयी थी | गांधी ने हिन्दुस्तानी भाषा की बात की थी | बार-बार वे हिन्दुस्तानी से अपनी मुराद भी जाहिर करते हैं , वो भाषा जिसे देश का मजदूर किसान बोलता है | यही वो हिन्दुस्तानी है जिसमे प्रेमचन्द लिख रहे थे | जिसमे उर्दू हिंदी का भेद बड़ा कम था जो अमीर खुसरो, कबीर, वली दकनी , नज़ीर अकबराबादी की जबान थी | यह ठेठ हिंदी थी कामगार हिंदी | इसके ठेठपने से ही आभिजात्य को चिढ़ थी | नतीजे ने ऐसी हिंदी गढ़ ली गयी जो खास के द्वारा ख़ास के लिए थी | दुर्भाग्य से जो गफलत सरकार ने की वही साहित्यकारों ने भी और उस हिंदी को साहित्य में प्रतिष्ठित किया जो कही बोली ही नहीं जाती थी | यहाँ प्रेमचन्द की परम्परा बिसार दी गई जो एक साथ हिंदी उर्दू को साथ लेकर चलते हुए आम भाषा को साहित्य का साधन बना रहे थे | यहाँ साहित्य भी अपने सरोकारों में जहाँ असफल रहा वहीं हिंदी उर्दू के झगड़े में सबसे बड़ा नुकसान निर्दोष भाषा को उठाना पडा |
इस पूरी बहस में एक सवाल और जुड़ता है कि बाज़ार ने कितना और किस तरह से हिंदी को बदला है ? भूमण्डलीकरण के दौर में भाषा का संकट किस तरह से संस्कृति का संकट बन गया है |
बाज़ार की सैद्धान्त्की जहाँ उपभोक्ता को केंद्र में रखती है तो भूमंडलीकरण की सैद्धान्त्की एकरूपता को केंद्र में रखती है | वो बहुलता को विविधता को अंतत: खत्म करना चाहेगी ही क्योंकि एक रूपता यानी एक भाषा एक बाज़ार एक मुद्रा उसके लिए मददगार है | साथ है बहुलता और स्थानीयता से जन्मे प्रतिरोध का संकट भी इस एकरूपता के आगमन के साथ समाप्त हो जाता है | इसलिए बाज़ार और भूमण्डलीकरण उस सीमा तक हिंदी को बदलते हैं जिस सीमा तक उसकी अपनी विविधता खत्म होकर वह एकरूपता का साधन नहीं बन जाती | आश्चर्य नहीं कि बाज़ार के लिए मुफीद ऐसी हिंदी तो इस दौर में फली फूली किन्तु स्थानीय भाषायें,बोलियाँ मिटती चली गयीं | बदलाव,टूट-फूट भाषा की अपनी अन्दुरुनी प्रक्रिया है किन्तु बाज़ार इसमें अपने नफे के लिए जबरिया दखल करता है | मीडिया की मंडी में हिंदी को देखकर इसे समझा जा सकता है | अखबारो में हिंदी को लेकर जो जबरदस्ती की गयी वो भी एक नमूना जिस पर प्रभू जोशी ने गहराई तक रौशनी डाली है | अखबारों ने सबसे पहले यलो पेज या युवाओं महिलाओं के परिशिष्टों में हिंदी के वाक्य में एक दो अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसकर जो शुरुआत की थी वो बाद में अंग्रेजी के एक वाक्य तक होते होते अब देवनागरी की जगह रोमन लिपि तक जा पहुंची है | यह अंग्रेजी द्वारा धीरे धीरे हिंदी को विस्थापित करने की सूक्ष्म साजिश है | जिसे हम विज्ञापन में भी देख सकते है | ये दिल मांगे मोर ..यही है राईट च्वाइस बेबी की शक्ल में जो हिंदी बाज़ार में खड़ी है वो खोखली होती जा रही है | उसके प्रतिरोध की शक्ति क्षीण होती जा रही है | एक ध्रुवीय विश्व के निर्माण से पहले एक रूपीय संस्कृति का निर्माण जरूरी है | बाज़ार जिसे करने में सलंग्न है | माल को बेचने के लिए वो स्थानीय भाषा को माध्यम बनाता है लेकिन उसकी मौलिकता में तोड़ फोड़ कर | इस तरह वो अपनी भाषा को धीरे-धीरे स्थापित भी करता है | जो वो बहुत पहले अफ्रीका में कर चुका है वही एशिया में करने के मिशन पर है यानी स्थानिकता को खत्म कर समूची दुनिया को यूरोप की जूठन बना देना | दरअसल यह पूँजी का ही चरित्र ही है जहाँ पूँजी की संस्कृति संस्कृति पर आक्रमण करते दिख रही है | भाषा चूंकि प्रतिरोध रचती है इसलिए ऐसी भाषा का निर्माण उसकी योजना है जो सिर्फ प्रयोजन मूलक हो संस्कृति मूलक नहीं |इसलिये भाषा से सामूहिक स्मृति को पोछकर साफ़ किया जा रहा है | मिथ को इतिहास और इतिहास को मिथ बनाया जा रहा है | अपने हिसाब से अनुकूलन किया जा रहा है | तो यह बाज़ार में खड़ी हिंदी की माया पर मुग्ध होने का नहीं उसके स्खलन पर क्षुब्ध होने का सवाल है | अब सवाल उठाये जाने चाहिये क्योंकि जैसा प्रेमचन्द ने कहा है “अब और सोना मृत्यु का लक्षण है |”
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