ये कोठेवालियां: अमृतलाल नागर
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“मेरे या किसी के घर के भी आसपास , दो-चार-दस दीवारों के हेर फेर में ना जाने ऐसी कितनी कहानियां बिखरी हुई हैं |
उन सबका निचोड़ क्या हैं ?
ये स्त्रियाँ क्या अपनी कामेच्छा से वश में होकर जाती हैं ?
वे जायाजीवी पति कैसे हैं ? किन परिस्थितियों में वे अपनी पत्नी की यह स्थिति स्वीकार करते होगे ?...
औरत पुरुष की तरह आज़ाद होकर अपनी कामेच्छा से सत्तर खसम करती फिरे तो और बात है , पर पेट के लिए औरत बिके , कोड़े मार मारकर साधी जाये , नफ्सपरस्त मर्दों के बाज़ार में किराये पर उठने वाली जिंस बने तो ..क्या कहूँ ,
तुफ़ है मर्द तेरी मर्दानगी पर , तेरी ऊँची सभ्यता पर |”
नियति के हाथों ऐसी ही अमानवीय स्थिति में धकेली जाकर मर्द की नफ्स का शिकार बनी ऐसी ही कोठेवाली औरतो का उन्ही की जुबानी ब्यान है “ये कोठेवालियां” |
देर से सही लेकिन खुश किस्मती से इस हफ्ते “ये कोठेवालियां” पढने को नसीब हुई |
“ये कोठेवालियां“ अमृत लाल नागर के लेखन का विषय और शैली दोनों ही स्तरों पर बोल्ड प्रयोग कहा जा सकता है |
जहाँ पहली बार वेश्या को लेकर हिंदी में एक साहित्यिक साहस किया गया अन्यथा ये विषय संस्कृत बांग्ला और उर्दू में तो कुलीन बन चुका था लेकिन हिंदी में ‘मस्त राम’ और ‘गर्म पकौड़ी’ की मेहरबानी से बदजात ही बना रहा |
अमृत लाल नागर उस लखनऊ से ही ताल्लुक रखते थे जो नवाबी चलन के साथ डेरेवालियों , तवायफो और रंडियों के लिए भी जाना जाता रहा था |
सबसे आदिम कहा जाने वाला यह पेशा इस देश में कभी कितनी इज्जत के लिए जाना जाता था यह संस्कृत साहित्य में सालवती , वसन्त सेना ,अम्बपाली की प्रतिष्ठा से जाना जा सकता है |
लेकिन समय के साथ समाज में उच्च आसन पर प्रतिष्ठित ‘वेश्या’ अपनी आसंदी से नीचे सरकती हुए समाज बहिष्कृत होकर एक गाली में बदल गयी |
अमृत लाल नागर की यह किताब उन्ही कोठेवालियों का समाजशास्त्रीय इतिवृत्तात्मक लेखा-जोखा है |
अमृत लाल नागर की लेखकीय चेतना मूलतः कथात्मक है लेकिन “ये कोठेवालियां” में उनकी कथात्मक कुशलता को लकवा सा मार गया झी और वे आत्मकथात्मक से शुरू होकर संस्मरणात्मक होते हुए साक्षात्कारात्मक होते हुए ग्रन्थ समीक्षात्मक हो जाते हैं | शैली की यह बहुलता मानो उनके विषय को साधने का साधन है जो अंत तक सधते नहीं जान पड़ता |
हालाकि कथात्मक कुशलता के साथ वेश्या को ही प्रेम त्रिकोण में रखकर वे तमिल महाकाव्य पर आधारित अपना लोकप्रिय उपन्यास ‘सुहाग के नुपुर’ भी लिख चुके थे |जिसमें एक नहीं कई अमर संवाद हैं जो मुझे आज भी जुबानी याद हैं | यथा –
“वेश्या पर अधिकार प्राप्त करने की इच्छा ही मृग मारिचिका है |”
“ कामदेव के धनुष का पद केवल कुलीन वेश्याओं को मिलना चाहिये”
और सबसे सुपर हिट यह –
“नारी का सौन्दर्य तभी तक आकर्षण रहता है जब तक उस पर किसी पुरुष का अधिकार नहीं होता |”
सुहाग के नुपुर से भिन्न ये कोठेवालियां ऐसे किसी स्मरणीय सम्वाद से वंचित है | अलबत्ता लूलू और बद्रेमुनीर जैसे लोग याद रह जाते हैं |
लूलू कितना ,मासूम और निरुपाय है यह मानो उसके नाम से ही ध्वनित है |
लूलू |
लूलू का सच उस बच्चे का सच है जिसका परिवार भूख के आगे हारकर जीने की राह में वेश्यावृति करने को मजबूर हो जाता है | जिसका बाप ही अपनी बीबी के लिए ग्राहक पकड़कर घर लाता है | और ग्राहक के आने पर लूलू पड़ोसी के घर की ओर धकेल दिया जाता है | जहाँ ग्राहक के के निपटने तक लेखक और उसका मित्र लूलू का ख्याल रखते हैं | ग्राहक के जाते ही माँ बाहर से लूलू को आवाज़ देकर बुला ले जाती है |
“ यह सब होते हुए भी हम दो भद्र जन आर्थिक कारणों से एक भद्र महिला को भद्र कुल के पुरुष पति के आदेश से वेश्या बनते देख कर मन ही मन गूंगे बावले हो गये थे | आस्था के जिस शैल-शिखर पर आमतौर पर भद्र कुलीन समाज के पाँव टिके रहते हैं मेरे लिए वह बालू का ढूह हो गया |”
लूलू के पड़ोस से जब लेखक किरायेदारी छोड़कर अन्यत्र जाने लगता है तब का बयान इस तरह से है –
“लूलू हमारे पास गया | विदा होने से पहले उसे देने के लिए मै टाफियां लाया था |
उसे दीं सिर पर हाथ फेरा |
लूलू की माँ यथावत खड़ी रही |
जब चलने लगे तो उसकी आँखों में सहसा आँसू उमड़ आये –‘अबी से लूलू को कौन देखेगा?’ कहा और सूनी आँखों से कमरे के बाहर देखने लगी |...
‘अबी से लूलू को कौन देखेगा ?
इस वाक्य में बहुत बड़ा प्रश्न तड़प रहा था
हम कायर की तरह उसका उत्तर दिए बिना ही चले आये |”
बद्रेमुनीर की दास्तान भयावह रूप से कारुणिक दास्तान है |
एक औरत की बेबसी और उस पर नियति और समाज का अत्याचार पाठक के ज़िगर को निचोड़ कर रख देता है |
बद्रेमुनीर वेश्याकुल में नहीं जन्मी थी लेकिन रफीक नाम के गुंडे दलाल ने उसे उसके माँ-बाप को सवा सौ रूपये देकर उससे निकाह किया था और फिर लखनऊ लाकर किसी अनवरी बाई के कोठे पर रख दिया | जहां लडकियां धंधे में धकेलने के लिए गरम सलाखो से दागी जाती थीं | बद्रेमुनीर किस्मत से जब तक सेवाटहल करने के काबिल रही बची रही लेकिन चेचक निकलते ही बदसूरत क्या हुई रफीक का दिल फिर गया और उसे उस चकलेघर से मारपीट कर निकाल दिया गया तब बद्रेमुनीर ने ऐसे चकलेघर में पनाह पायी जहां गत यौवनायें नरक से बदतर नरक में रहती थीं |
इस नरक में लेखक जब उसकी सिफलिस की दर्दनाक बीमारी में बद्रेमुनीर के बुलाने पर उससे मिलने जाता है |
“ एक ही दिन में दो व्यक्तियों से पाया यह रोग तेज़ी से बढ़ा कि चार दिन में सारे बदन में दाने भर गये |
कमर से लेकर नाभि के ऊपर तक तो पकी फुंसियाँ और उनके घावों के छत्ते के छत्ते दिखलाई देते थे |
बद्रेमुनीर अपने रोग में जो कष्ट पा रही थी वह तो था ही |
उधार के तानों , गालियों और निकाल देने की धमकियों से उसे घनघोर कष्ट हो रहा था |”
बद्रेमुनीर ने मिलने पर जो कहा वह लेखक को चुभकर रह जाता है –
“मै कहती थी ख़ुदा नहीं है –ख़ुदा है –ख़ुदा है – ख़ुदा है |”
चार दिन बाद उसकी खबर लेने जब लेखक दुबारा उस नरक में जाता है तो बताया जाता है कि बद्रेमुनीर कुछ घंटो पहले मर गयी |
“अपने टाट टप्पर के रंग महल में जमीन पर बद्रेमुनीर की लाश ढकी रखी थी |
चारपाई वहां से हटाई जा चुकी थी |
कफ़न हटाकर दढ़ियल ने मुंह दिखलाया |
मेरे मुँह से बेतहाशा चीख निकल गई |चार रोज पहले ही देखा हुआ चेहरा भी अब पहचाना ना जान पड़ता था |
आधा दाहिना गाल , नीचे का आधा होंठ , ऊपर का पूरा होंठ , नाक के नकसोरों तक तीन दिन में ही सड़कर गायब हो चुका था |
अंदर के भूत जैसे दांत और भयानक मुखाकृति देखकर मुझे चक्कर आने लगा , पाँव लडखडाने लगे |...मैंने अपने जीवन में इससे भयंकर और कुछ नहीं देखा |”
कोठेवालियों के जीवन के ऐसे ही मर्मान्तक सच को अमृतलाल नागर ने “ये कोठेवालियां” में लिपिबद्ध किया है |
उनके सुधार और इस बुराई के समाधान पर चर्चा भी की है |
सन्दर्भ और प्रसंग सहित उनके विभिन्न रूपों यथा डेरेदार , तवायफ , गणिका , पतुरिया , कसबियां का फर्क बताया है | गायन और नृत्य में उनके अवदान का उल्लेख भी किया है |
कोठेवालियों को मानवी के रूप में स्थापित करने और समाज में उनके प्रति पूर्वाग्रह को तोड़ने में वे कामयाब रहें हैं |
लेकिन वे एक कथाकार के रूप में स्वयं को अनुपस्थित रखते हैं और वृतचित्रकार के रूप में सम्वेदना का वो सृजन करने से चूक जाते हैं जिसके लिए वे जाने जाते रहे हैं ||
||हनुमंत किशोर ||
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