पितर श्राद्ध और हमारे बुजुर्ग
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यदापि पोष मातरं पुत्र: प्रभुदितो धयान्।
इतदगे अनृणो भवाम्यहतौ पितरौ ममां॥
अर्थात "जिन माता-पिता ने अपने अथक प्रयत्नों से पाल पोसकर मुझे बड़ा किया है, अब मेरे बड़े होने पर जब वे अशक्त हो गये हैं तो वे 'जनक-जननी' किसी प्रकार से भी पीड़ित न हों, इस हेतु मैं उसी की सेवा सत्कार से उन्हें संतुष्ट कर अपा आनृश्य (ऋण के भार से मुक्ति) कर रहा हूँ।" (यजुर्वेद)
हमारी संस्कृति के अतिरिक्त शायद ही किसी और संस्कृति में मातृ ऋण , पितृ ऋण और गुरु ऋण की अवधारणा विकसित की गयी हो शायद ही किसी और संस्कृति में पितर यानी पूर्वज देव कहलाते हों और उनकी मुक्ति के लिये पूरा एक पाख आरक्षित हो | लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही कटु सत्य है कि शायद किसी और समाज में ‘जियत परोसे माड़ मरत परोसे खांड’ जैसी लोकोक्तियाँ प्रचलित हो जो बुजुर्गों को लेकर हमारे समाज के छद्म और पाखंड को उजागर करती है | सम्पत्ति के साथ बूढ़े माँ-बाप का बंटवारा भी सिर्फ हमारे समाज में ही देखा जाता है | ऐसा विद्रूप यहीं दिखाई देता है कि बाप बड़के के हिस्से तो माँ लहुरे के हिस्से | यह सिर्फ कहानियों का सच नहीं जमीनी हक़ीकत है कि ३१ वी तारीख को घर के बुजुर्ग माँ-बाप भूखे ही रह जाते है क्योंकि एक दिन तेरे यहाँ से एक दिन मेरे यहाँ से भोजन की व्यवस्था में ३१ वा दिन किसी की ज़िम्मेदारी में नहीं पड़ता | उस पर सितम यह कि रसना उम्र के इसी पड़ाव पर सबसे ज्यादा लोभी होती हैं | प्रेमचन्द की ‘बूढी काकी’बरबस याद आती है जिसे भूख और पकवान पीड़ा एक साथ सताती है |
“बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियाँ, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहतीं और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता अथवा बाज़ार से कोई वस्तु आती और न मिलती तो ये रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़कर रोती थीं|” (बूढ़ी काकी )
लेकिन इस पर दोहरा दुःख यह कि परिवार से उपेक्षा और तिरस्कार के चलते उसे मेहमानों की जूठी पत्तल से टुकड़े बीन-बीन कर खाने के लिए विवश होना पड़ता है –
“उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकर झूठे पत्तलों के पास बिठा दिया। दीन, क्षुधातुर, हत् ज्ञान बुढ़िया पत्तलों से पूड़ियों के टुकड़े चुन-चुनकर भक्षण करने लगी। ओह... दही कितना स्वादिष्ट था, कचौड़ियाँ कितनी सलोनी, ख़स्ता कितने सुकोमल। काकी बुद्धिहीन होते हुए भी इतना जानती थीं कि मैं वह काम कर रही हूं, जो मुझे कदापि न करना चाहिए। मैं दूसरों की झूठी पत्तल चाट रही हूँ। परन्तु बुढ़ापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छाएँ एक ही केन्द्र पर आ लगती हैं। बूढ़ी काकी में यह केन्द्र उनकी स्वादेन्द्रिय थी|” (बूढ़ी काकी )
कहानी का पहला वाक्य ही बुजुर्ग जीवन की प्रवृत्ति और समस्या का कथन, इस रूप में करता है कि बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। यही वजह है की बूढ़े और बच्चे एक दूसरे को अच्छी तरह से ना समझते हैं और पसंद भी करते हैं | “बूढी काकी” को भी संवेदना ‘लाड़ली’ से मिलती है जो उसके लिए कोठरी में खाना लेकर जाती है | बच्चे और बूढों के इसी रागात्मक लगाव की अन्य चर्चित कहानी ममता कालिया की “आजादी” है | इसमें मुनिया ही लंगड़ी दादी की इकलौती हमदर्द है जो उसके लिए स्कूल से आजादी के उत्सव की मिठाई लेकर आती है जिसे खाने के पहले ही दादी अपने दुःख से आज़ाद हो चुकी होती है |
बच्चों और बुजुर्गो की यह युति परम्परागत संयुक्त परिवार में जिस तरह से देखने को मिलती थी वह आज की न्यूक्लियर फैमिली में नहीं देखी जाती और महानगरीय एकल परिवार के चलते बुजुर्गो में आयु का दंश तेज़ हो चला है |भयावह अकेलापन जिसकी झलक जयंत दलवी के नाटक ‘संध्याछाया’ में देखने को मिलती है | जहाँ वृद्ध दम्पत्ति का लड़का विदेश से लौटकर नही आता और वे चरम अवसाद के क्षणों में आत्म ह्त्या कर लेते हैं |
बुजुर्गो की अपने ही लोगो द्वारा खोज-खबर ना लेना , उनकी देखभाल ना करना और उनके साथ दूसरे लोगों द्वारा किया गया अमानवीय व्यवहार आज ‘एल्डर एब्यूज’ कहकर पुकारा जाता है |
‘एल्डर एब्यूज’ की एक बानगी दिनेश भट्ट की हालिया कहानी “अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे” देती है | जिसमे अपनी बेटी के ही हाथों छला गया बाप कहानी के अंत में हंसते- हंसते दयनीय तरीके से बिलखकर रो उठता है |
‘एल्डरएब्यूज’ किसी एक देश काल या संस्कृति तक ही सीमित नहीं रहा | इसका विस्तार हर देश काल में देखा गया | ‘सीमोन द वुआ’ ने इसका समाजशास्त्रीय अध्यन किया और पाया कि वृद्ध की यह सामाजिक प्रस्थिति इसलिये है क्योकि उत्पादन और आर्थिक क्रिया कलाप में उनका योगदान कम होता जाता है | सीमोन लिखती हैं -"समाज में जब तक व्यक्ति का योगदान रहा, तब तक वह समाज का अभिन्न अंग बना रहा और जैसे ही बूढ़ा हो गया, वह समाज से कट गया और केवल एक ‘वस्तु’ बन कर रह गया; ऐसी वस्तु जिसका न कोई मोल है, न किसी काम का है और न ही कुछ पैदा कर सकने योग्य!”
सीमोन आगे यह भी मानती हैं कि वृद्धों और महिलाओं को इसलिए भी इतिहास व साहित्य में अधिक स्थान नहीं मिला क्योंकि वे एक ऐसी जमात हैं जिनका राजनीति और इतिहास रचने में कोई योगदान नहीं रहा,सिवा कुछ अपवादों के |
सीमोन के कथन की सच्चाई को हम अपने आसपास देख सकते हैं |
प्रेमचन्द की ही एक और कहानी है ‘पंच-परमेश्वर’ इसमें खाला के पास जब तक जमीन है परिवार में उसकी इज्जत और पूछ-परख बनी रहती है,लेकिन जमीन दूसरों के नाम चढ़ते ही उसका तिरस्कार शुरू हो जाता है |
इसी तरह उषा प्रियंवद की ‘वापसी’ के पेशन याफ्ता गजोधर बाबू है |
घर के बुजुर्गो को अक्सर ताना दिया जाता है कि मकान-जमीन अभी भी अपने नाम किये हैं, क्या पीठ पर लाद कर ले जायेंगे? गाँव में जहाँ परिवार के बड़े बुजुर्गो के नाम पर जमीन-जायदाद होती है उन्हें अपने महत्त्व का बोध बना रहता है | उनके आत्म सम्मान में गिरावट नहीं आती लेकिन शहरी बुजुर्ग के मामले में परिवार में उसका आर्थिक योगदान शून्य होते ही उसके भीतर फालतू होने का भाव घर कर जाता है और इस कारण अवसाद की स्थिति भी बनती देखी गयी है |इसलिए बहेतर है बुजुर्ग के नाम को उसके रहते कागजों से खारिज ना किया जाये |
चाइल्ड एब्यूज की ही तरह एल्डर एब्यूज का अपराधी भी ज्यादातर मामलो में परिवार से या कोई परिचित या सम्बन्धी ही होता है | लेकिन चाइल्ड एब्यूज की तुलना में एल्डर एब्यूज इस लिए और घातक हो जाता है क्योंकि इस उम्र में शारीरिक और मानसिक आघात से रिकवरी धीमी हो जाती है |
यह धीमापन अकेले मेडिकल क्षेत्र में ही नहीं बुजुर्ग जीवन के हर क्षेत्र में घटित होने लगता है | यही धीमापन यानी मंदगति ही बुजुर्गियत की निशानी है | जैसे कोई नदी सूखने से पहले धीमी होने लगे या चराग बुझने के पहले धुँआ-धुँआ | हमारे दौर में जहां जीवन शैली निरंतर तीव्र और जटिल हो रही है वही सीखने की क्षमता मंद होने से कारण बुजुर्ग को इस तीव्र बदलती जीवन शैली उसके मूल्यों और तकनीक से तालमेल बैठाना मुश्किल होता जाता है और यही उनके तनाव और वृद्ध भ्रान्ति की मुख्य वजह बनती है | जैसे उदय प्रकाश की कहानी ‘पाल गोमरा का स्कूटर’ में ‘पालगोमरा’ |पाल गोमरा का वास्तविक नाम राम गोपाल है लेकिन वह देखता है कि कितनी तेज़ी से टेक्नालोजी बदल रही है | पहचान के इस संकट से जूझते हुए उसे सबसे पहले अपना नाम दिखाई देता है जिसे बदलकर उसे लगता है कि वो ‘दौड़’ में बना रह सकता है | फिर समूची टेक्नालोजी के रूप में उसे स्कूटर नज़र आता है जिस पर काबू पाकर वह टेक्नालोजी को काबू करने का स्वप्न देखता है और अंत में सफल ना होने पर लगभग विक्षिप्त हो जाता है |
दरअसल यह नया नहीं सीख पाना ही बुढ़ापा है | और यदि बुढ़ापे से बचने का एक ही तरीका है निरंतर नया सीखते रहना | यह ललक मस्तिष्क के न्यूरान को सक्रिय बनाये रहती है और बुढ़ापा आता भी है तो दबे पाँव कम से कम चोट करता |
मुझे इस सिलसिले में निर्मला हांडे की मिसाल याद आती है |वे कोई सिलिब्रेटी नहीं है उनका परिचय सिर्फ इतना है कि जीने की ललक से भरपूर महिला हैं | वो मेरी सबसे बुजुर्ग वाट्स एप फ्रेंड हैं जो उम्र के अस्सीवे पड़ाव पर हैं | लड़का कुवैत में है लड़की अपने घर में | वे अपने को सक्रिय बनाये रखने के लिए कई सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से खुद को जोड़े रखती है | जब उन्होंने लोगों को वाट्स एप पर देखा तो वाट्स एप के लिए स्मार्ट फोन लिया और उसे सीखने लगीं |
बुढ़ापा इसी सीखने के बंद होने पर आता है | निरंतर नया सीखने और खुश रहने से ही बुढ़ापे की गति को धीमा किया जा सकता हैं | पश्चिम के देशों में इसी लिए बुढ़ापे को रोकने के लिए नयी थेरपी डांस थेरपी बन चुकी है | हमारे यहाँ जो योगा और लाफ्टर है |
लेकिन सबसे कारगर चिकित्सा बुजुर्गों के लिए यदि कोई है तो वो है प्रेम और परिचर्या | ममता कालिया की कहानी ‘आजादी’ की लंगड़ी दादी का मामला ही देखे जो अपने लड़के के आते ही स्वस्थ होने लगती है और बिना थके हारे उसकी आवभगत में जुटी रहती है |
यह बराबर याद रखा जाये कि वृद्धावस्था एक जैविक स्थिति से अधिक एक सामाजिक स्थिति है | यह उदास पतझड़ है जिसे हम उनके चारोतरफ ख़ुशी का माहौल बनाकर दूर कर सकते है |लेकिन हो यह रहा है कि परिवार बच्चों पर केन्द्रित हो रहे है | उनकी खुशियाँ उनके कैरियर के आगे घर के बुजुर्ग हाशिये पर आ गये हैं | उनके पास बेड रूम हैं तो इनके हिस्से गैलरी या सहरी | यहाँ संतुलन की जरूरत है |
जीवन के अस्ताचल में जो सूर्य है उसका डूबना तय है | आत्मीयता और प्रेम से साथ बिताये क्षणों के द्वारा जीवन के इस अटल सत्य का सुख से किया जा सकता है। प्रेम और आत्मीयता का स्थान पैसा नहीं ले सकता जैसे कि ‘संध्या छाया’ बूढ़े माँ-बाप बेटे की आर्थिक इमदाद को मना कर देते हैं |दुखद है कि शहरों में जहाँ तेज़ी से फ्लेट,अपार्टमेन्ट और कालोनियां बन रही है वहीं वृद्धाश्रम का भी विस्तार हो रहा है | वृद्धाश्रम हमारे समाज के मूल्यों पर एक प्रश्नचिन्ह हैं |
आज जबकि युवाओं की संख्या वुजुर्गो से अधिक है और यह हाल है ,तब उस स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है जब आने वाले दिनों में जन्म दर घटते जाने से युवा की संख्या घटती जायेगी और औसत उम्र बढ़ते जाने से वृद्धो की संख्या बढ़ती जाएगी | हमारे यहां 1991 में 60 वर्ष से अधिक आयु के 5 करोड़ 60 लाख व्यक्ति थे, जो 2007 में बढ़कर 8 करोड़ 40 लाख हो गये। यानी आने वाले दिनों में युवा कन्धो पर बोझ बढ़ता जाना है | ऐसे में ज़िम्मेदारी का निर्वहन और तत्परता से करना होगा |
यह हमारा फर्ज़ है कि जिनकी थकान हमारी नींद में शामिल है ,जिनके संघर्ष हमारे सपनो के पीछे है हम उन्हें उनकी जीवन संध्या में एक प्रेम भरा सानिध्य अवश्य दें |
यही हमारी ऋण मुक्ति है |
यही असली पितर श्राद्ध है ||
||हनुमंत किशोर ||
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