शास्त्रार्थ की परम्परा बनाम शस्त्र की संस्कृति
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१३ अक्टूबर को कला साहित्य की दुनिया में दो घटनाये हुई | एक राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर | रास्ट्रीय स्तर पर भारतीय जन नाट्य संघ ‘इप्टा’ ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन (२ -४ अक्टूबर,इंदौर )में हुए हमले के विरोध में प्रतिरोध दिवस मनाया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नोबल पुरुस्कार विजेता इतालियन रंगकर्मी-लेखक दारियो फो का देहान्त हो गया | इन दोनों बातो का इससे अधिक सम्बन्ध है कि इप्टा और दारियो फो दोनों का सम्बन्ध नाटक से है बल्कि ये दोनों सत्ता के लिए अप्रिय और समाज के वर्चस्ववादी तबके की असहमति के शिकार हैं | ‘इप्टा’ के रास्ट्रीय अधिवेशन को जहाँ कथित राष्ट्रवादीसंस्कृति के ऐतराज़ का सामना करना पड़ा वही दारियो फो को भी अपनी प्रस्तुतियों और टिप्पणियों के लिए पुलिस-कचहरी से लड़ना पड़ा | दोनों ही के मामले में अचानक ‘संस्कृति’ खतरे में पड़ जाती दिखती है | फो के मामले में हमें संस्कृति की उतनी पहचान नहीं है लेकिन ‘इप्टा’ यानी हमारे देश के मामले में यह बहुत साफ़ है |
देश में जहां बात-बात पर संस्कृति की दुहाई देना आज चलन में है वहां यह बात पहले समझ लेनी चाहिये कि संस्कृति अपने आप में हिन्दुस्तान के लिए बहुत पहले से परिचित प्रत्यय नहीं है | यहाँ इससे परिचय कोई सदी भर पुराना है बस | अंग्रेजी शब्दकोष में जहां इसका अर्थ बेक्टीरिया,सेल से लेकर प्रथा, आचरण और कला के रूपायन तक बिखरा पड़ा है वहीँ भारतीय सन्दर्भ में इसका प्रयोग १९ सदी के पहले तक नहीं मिलता | जीवन शैली से लेकर ‘आधुनिक भारतीय संस्कृति-सम्वाद’ में गिरीश कर्नाड कहते हैं कि कल्चर के लिए संस्कृति शब्द की उत्त्पत्ति रवीन्द्रनाथ टेगौर ने की थी | सुमित कुमार चटर्जी ने कृषि से जोड़कर ‘कृष्टि’ शब्द सुझाया था जो कल्चर शब्द की व्युत्पत्ति के निकट था लेकिन रवीन्द्रनाथ ने कल्चर के लिए ‘संस्कृति’ शब्द रचा | तब से इस संस्कृति का इतना मंथन हुआ कि यह सहस्त्रमुखी होकर अपना मुख ही भूल गयी | पश्चिम में भी रेमंड विलियम ने इसे परिभाषित करने की कोशिशो के बाद यह कहकर छोड़ दिया कि इसे समझना मुश्किल है | गिरीश कर्नाड भारतीय सन्दर्भ में कल्चर के विकल्प में ‘सम्प्रदाय’ के प्रयोग के हिमायती हैं |
यहाँ यह बताने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जो ‘प्रत्यय’ अभी बहुत नया है और ठीक ठीक परिभाषित भी नहीं है वह किन्ही एक-दो टीका टिप्पणी से कैसे खतरे में पड़ सकता है उलटे उसके पुनर्परिभाषित और समृद्ध होने से इंकार नहीं किया जा सकता | (आगे लेख में अवधारणा के निर्माण में यही प्रत्यय माध्यम है )
भारतीय विरासत में जो परम्परा है वहां सत्य या त्तत्व तक वाद –विवाद-सम्वाद के माध्यम से पहुँचने का जोर है | हमारे प्राचीन ग्रन्थ उद्घोष करते हैं “वादे-वादे जायते तत्वबोध:” | भारतीय परम्परा में मीमांसा और ज्ञान के क्षेत्र में शास्त्रार्थ की ही स्वीकृति थी शस्त्र शत्रु के लिए अनुज्ञात था विद्वान् के लिए नहीं |इसके उल्ट असहमति का आदर करते हुए उसे ‘मुंडे-मुंडे मितिर भिन्ना’ कहकर सम्मानित तक किया गया |
अतीत में याज्ञवलक्य-गार्गी , अष्टावक्र-बंदी , शंकराचार्य –कुमरिल भट्ट ,शंकराचार्य- मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ का ज़िक्र मिलता है | जहां पराजित पक्ष विजयी पक्ष के मत को मानकर उसका अनुयायी बन जाता था |
अष्टावक्र-बंदी के शास्त्रार्थ को कमलेश्वर सम्पादित कथा संस्कृति में अमरनाथ शुक्ल ने कहानी की तरह से लिखा है | कहानी यह है कि अष्टावक्र के पिता को बंदी नाम के विद्वान् ने जल समाधि के लिए बाध्य किया था | बड़े होकर अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में उसी बंदी को शास्त्रार्थ की चुनौती देकर पराजित करते हैं | बंदी जब उनसे अपना गुरु बनने का आग्रह करता है तब अष्टावक्र उसे उसके पूर्व कृत्य का स्मरण कराकर कहते हैं - ‘‘मैं गुरु नहीं बन सकता। तुम्हारा दण्ड यही है कि तुम अपने शास्त्र-ज्ञान से दूसरों को पराजित कर उसका जीवन नष्ट करने की बजाय, उन्हें अच्छे उपदेश देकर ज्ञानी बनाओ। मनुष्य और मानवता के विकास में सहायक बनो। शास्त्र को शस्त्र मत बनाओ। शास्त्र-ज्ञान जीवन का विकास करता है। जबकि शस्त्र जीवन का विनाश करता है। ज्ञानी होने के अहंकार ने तुम्हारी बुद्धि दूषित कर दी है। भविष्य में तुम्हें मृत्यु-पर्यन्त कभी भी ज्ञानी ऋषियों की प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी।’’
इसी तरह शंकराचार्य और मंडनमिश्र का शास्त्रार्थ भी मतभिन्नता को तर्क और वाद-विवाद से हल करने का उदाहरण प्रस्तुत करता है | मंडन मिश्र कर्मकांडी थे जबकि शंकराचार्य अद्वैत वेदांती | जैसा कहा जाता है बनारस में मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ २१ दिन तक चला और मंडन मिश्र की पत्नी भारती इसकी निर्णायक थी | मंडन मिश्र जब शास्त्रार्थ में पराजित हो गए और शर्त के अनुसार उन्हें सन्यासी होना हुआ तब उनकी भारती ने शंकराचार्य से कहा कि उनके पति का सन्यासी हो जाना उनके साथ अन्याय है और चूँकि वो उनकी अर्धांग्नी हैं इसलिए वे शंकराचार्य को चुनौती देती हैं कि उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित किया जाये | ‘शंकरदिग्विजय’ में जैसा वर्णित है उन्होंने शंकराचार्य से ‘काम’ और सन्तान उत्त्पत्ति विषयक प्रश्न किये , जिनका समाधान करने के लिए शंकराचार्य ने समय मांगा | कालांतर में प्रश्नों का कर ;भारती’ को पराजित किया | कतिपय मान्याताओ के अनुसार मंडन मिश्र सन्यासी होकर सुरेश्वाचार्य हुए , जो अग्निहोत्र के स्थान पर शुद्ध ज्ञान को मोक्ष का साधन निरुपित करते हैं “ज्ञानं विशिष्टम न तथाहि यज्ञ”| ये कुछ उदाहरण मात्र हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय पम्परा में मत भिन्नता की स्थिति में वाद-विवाद-संवाद का आलम्बन ही लिया रहा है |गूढ़ विषय का शास्त्रार्थ से समाधान करने की यह परम्परा केवल अभिजात्य तक ही नहीं अपितु लोक तक विस्तृत थी | गाँव-देहात में शादी ब्याह के अवसर जनमासे में दोनों पक्ष इकट्ठे होकर किसी विषय पर तर्क वितर्क करते थे यह एक तरह से दूसरे पक्ष को जानने समझने का भी बहाना हुआ करता था |भारत से बाहर एक परम्परा रूप में यह लक्षण चीन में दिखाई देता है और व्यक्ति के रूप में यूनान में सुकरात में | सुकरात एथेंस की सड़को पर प्रश्न पूछते है और शास्त्रार्थ करते हैं | हालांकि सुकरात का यह शास्त्रार्थ वहां सत्ता को सहन नही होता और वे विषपान को विवश किये जाते हैं | यद्यपि भारत में भी शास्त्रार्थ की गौरवशाली परम्परा के विलोम में शस्त्र के द्वारा शत्रु को पराजित करने की अधम धारा भी रही है | शुंग काल में एक बौद्ध भिक्षु के सर के बदले एक स्वर्ण मुद्रा जैसी कहानियां भी प्रचलित हैं लेकिन इन्हें वरेण्य नहीं कहा जा सकता | वरेण्य और अनुकरणीय तो वही है जिसमे ज्ञान ही ज्ञान को पराजित करता है |
भारत में शास्त्रार्थ को महत्वपूर्ण स्थान देने के पीछे यह ज्ञान से ज्ञान को परिमार्जित करने की सोच जान पड़ती है | इसे ज्ञान के प्रति आग्रहशील और ग्रहणशील दोनों ही माना जा सकता है |ऋग्वेद का बड़ा प्रसिद्ध मन्त्र है ‘आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:’ अर्थात हमारे लिए सभी ओर से कल्याणकारी विचार आयें |
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१३ अक्टूबर को कला साहित्य की दुनिया में दो घटनाये हुई | एक राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर | रास्ट्रीय स्तर पर भारतीय जन नाट्य संघ ‘इप्टा’ ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन (२ -४ अक्टूबर,इंदौर )में हुए हमले के विरोध में प्रतिरोध दिवस मनाया तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नोबल पुरुस्कार विजेता इतालियन रंगकर्मी-लेखक दारियो फो का देहान्त हो गया | इन दोनों बातो का इससे अधिक सम्बन्ध है कि इप्टा और दारियो फो दोनों का सम्बन्ध नाटक से है बल्कि ये दोनों सत्ता के लिए अप्रिय और समाज के वर्चस्ववादी तबके की असहमति के शिकार हैं | ‘इप्टा’ के रास्ट्रीय अधिवेशन को जहाँ कथित राष्ट्रवादीसंस्कृति के ऐतराज़ का सामना करना पड़ा वही दारियो फो को भी अपनी प्रस्तुतियों और टिप्पणियों के लिए पुलिस-कचहरी से लड़ना पड़ा | दोनों ही के मामले में अचानक ‘संस्कृति’ खतरे में पड़ जाती दिखती है | फो के मामले में हमें संस्कृति की उतनी पहचान नहीं है लेकिन ‘इप्टा’ यानी हमारे देश के मामले में यह बहुत साफ़ है |
देश में जहां बात-बात पर संस्कृति की दुहाई देना आज चलन में है वहां यह बात पहले समझ लेनी चाहिये कि संस्कृति अपने आप में हिन्दुस्तान के लिए बहुत पहले से परिचित प्रत्यय नहीं है | यहाँ इससे परिचय कोई सदी भर पुराना है बस | अंग्रेजी शब्दकोष में जहां इसका अर्थ बेक्टीरिया,सेल से लेकर प्रथा, आचरण और कला के रूपायन तक बिखरा पड़ा है वहीँ भारतीय सन्दर्भ में इसका प्रयोग १९ सदी के पहले तक नहीं मिलता | जीवन शैली से लेकर ‘आधुनिक भारतीय संस्कृति-सम्वाद’ में गिरीश कर्नाड कहते हैं कि कल्चर के लिए संस्कृति शब्द की उत्त्पत्ति रवीन्द्रनाथ टेगौर ने की थी | सुमित कुमार चटर्जी ने कृषि से जोड़कर ‘कृष्टि’ शब्द सुझाया था जो कल्चर शब्द की व्युत्पत्ति के निकट था लेकिन रवीन्द्रनाथ ने कल्चर के लिए ‘संस्कृति’ शब्द रचा | तब से इस संस्कृति का इतना मंथन हुआ कि यह सहस्त्रमुखी होकर अपना मुख ही भूल गयी | पश्चिम में भी रेमंड विलियम ने इसे परिभाषित करने की कोशिशो के बाद यह कहकर छोड़ दिया कि इसे समझना मुश्किल है | गिरीश कर्नाड भारतीय सन्दर्भ में कल्चर के विकल्प में ‘सम्प्रदाय’ के प्रयोग के हिमायती हैं |
यहाँ यह बताने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जो ‘प्रत्यय’ अभी बहुत नया है और ठीक ठीक परिभाषित भी नहीं है वह किन्ही एक-दो टीका टिप्पणी से कैसे खतरे में पड़ सकता है उलटे उसके पुनर्परिभाषित और समृद्ध होने से इंकार नहीं किया जा सकता | (आगे लेख में अवधारणा के निर्माण में यही प्रत्यय माध्यम है )
भारतीय विरासत में जो परम्परा है वहां सत्य या त्तत्व तक वाद –विवाद-सम्वाद के माध्यम से पहुँचने का जोर है | हमारे प्राचीन ग्रन्थ उद्घोष करते हैं “वादे-वादे जायते तत्वबोध:” | भारतीय परम्परा में मीमांसा और ज्ञान के क्षेत्र में शास्त्रार्थ की ही स्वीकृति थी शस्त्र शत्रु के लिए अनुज्ञात था विद्वान् के लिए नहीं |इसके उल्ट असहमति का आदर करते हुए उसे ‘मुंडे-मुंडे मितिर भिन्ना’ कहकर सम्मानित तक किया गया |
अतीत में याज्ञवलक्य-गार्गी , अष्टावक्र-बंदी , शंकराचार्य –कुमरिल भट्ट ,शंकराचार्य- मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ का ज़िक्र मिलता है | जहां पराजित पक्ष विजयी पक्ष के मत को मानकर उसका अनुयायी बन जाता था |
अष्टावक्र-बंदी के शास्त्रार्थ को कमलेश्वर सम्पादित कथा संस्कृति में अमरनाथ शुक्ल ने कहानी की तरह से लिखा है | कहानी यह है कि अष्टावक्र के पिता को बंदी नाम के विद्वान् ने जल समाधि के लिए बाध्य किया था | बड़े होकर अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में उसी बंदी को शास्त्रार्थ की चुनौती देकर पराजित करते हैं | बंदी जब उनसे अपना गुरु बनने का आग्रह करता है तब अष्टावक्र उसे उसके पूर्व कृत्य का स्मरण कराकर कहते हैं - ‘‘मैं गुरु नहीं बन सकता। तुम्हारा दण्ड यही है कि तुम अपने शास्त्र-ज्ञान से दूसरों को पराजित कर उसका जीवन नष्ट करने की बजाय, उन्हें अच्छे उपदेश देकर ज्ञानी बनाओ। मनुष्य और मानवता के विकास में सहायक बनो। शास्त्र को शस्त्र मत बनाओ। शास्त्र-ज्ञान जीवन का विकास करता है। जबकि शस्त्र जीवन का विनाश करता है। ज्ञानी होने के अहंकार ने तुम्हारी बुद्धि दूषित कर दी है। भविष्य में तुम्हें मृत्यु-पर्यन्त कभी भी ज्ञानी ऋषियों की प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी।’’
इसी तरह शंकराचार्य और मंडनमिश्र का शास्त्रार्थ भी मतभिन्नता को तर्क और वाद-विवाद से हल करने का उदाहरण प्रस्तुत करता है | मंडन मिश्र कर्मकांडी थे जबकि शंकराचार्य अद्वैत वेदांती | जैसा कहा जाता है बनारस में मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ २१ दिन तक चला और मंडन मिश्र की पत्नी भारती इसकी निर्णायक थी | मंडन मिश्र जब शास्त्रार्थ में पराजित हो गए और शर्त के अनुसार उन्हें सन्यासी होना हुआ तब उनकी भारती ने शंकराचार्य से कहा कि उनके पति का सन्यासी हो जाना उनके साथ अन्याय है और चूँकि वो उनकी अर्धांग्नी हैं इसलिए वे शंकराचार्य को चुनौती देती हैं कि उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित किया जाये | ‘शंकरदिग्विजय’ में जैसा वर्णित है उन्होंने शंकराचार्य से ‘काम’ और सन्तान उत्त्पत्ति विषयक प्रश्न किये , जिनका समाधान करने के लिए शंकराचार्य ने समय मांगा | कालांतर में प्रश्नों का कर ;भारती’ को पराजित किया | कतिपय मान्याताओ के अनुसार मंडन मिश्र सन्यासी होकर सुरेश्वाचार्य हुए , जो अग्निहोत्र के स्थान पर शुद्ध ज्ञान को मोक्ष का साधन निरुपित करते हैं “ज्ञानं विशिष्टम न तथाहि यज्ञ”| ये कुछ उदाहरण मात्र हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय पम्परा में मत भिन्नता की स्थिति में वाद-विवाद-संवाद का आलम्बन ही लिया रहा है |गूढ़ विषय का शास्त्रार्थ से समाधान करने की यह परम्परा केवल अभिजात्य तक ही नहीं अपितु लोक तक विस्तृत थी | गाँव-देहात में शादी ब्याह के अवसर जनमासे में दोनों पक्ष इकट्ठे होकर किसी विषय पर तर्क वितर्क करते थे यह एक तरह से दूसरे पक्ष को जानने समझने का भी बहाना हुआ करता था |भारत से बाहर एक परम्परा रूप में यह लक्षण चीन में दिखाई देता है और व्यक्ति के रूप में यूनान में सुकरात में | सुकरात एथेंस की सड़को पर प्रश्न पूछते है और शास्त्रार्थ करते हैं | हालांकि सुकरात का यह शास्त्रार्थ वहां सत्ता को सहन नही होता और वे विषपान को विवश किये जाते हैं | यद्यपि भारत में भी शास्त्रार्थ की गौरवशाली परम्परा के विलोम में शस्त्र के द्वारा शत्रु को पराजित करने की अधम धारा भी रही है | शुंग काल में एक बौद्ध भिक्षु के सर के बदले एक स्वर्ण मुद्रा जैसी कहानियां भी प्रचलित हैं लेकिन इन्हें वरेण्य नहीं कहा जा सकता | वरेण्य और अनुकरणीय तो वही है जिसमे ज्ञान ही ज्ञान को पराजित करता है |
भारत में शास्त्रार्थ को महत्वपूर्ण स्थान देने के पीछे यह ज्ञान से ज्ञान को परिमार्जित करने की सोच जान पड़ती है | इसे ज्ञान के प्रति आग्रहशील और ग्रहणशील दोनों ही माना जा सकता है |ऋग्वेद का बड़ा प्रसिद्ध मन्त्र है ‘आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:’ अर्थात हमारे लिए सभी ओर से कल्याणकारी विचार आयें |
तब नीर क्षीर विवेक की कल्पना की गयी | सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय | लेकिन किसी भी प्रतिकूल या अप्रिय विचार का निषेध फिर भी नहीं है | संस्कृति के प्रत्यय में यदि कहें तो विरोधी विचार के प्रति सहिष्णुता ,समावेशी प्रकृति और उसे पचा लेने की क्षमता ही भारतीय संस्कृति के अब तक बचे रहने का आधार है | यह इसकी विकट पाचन शक्ति ही थी कि कई बाहरी-अंदरूनी हमलों के बाद भी अपने को बदलते हुए यह निरंतर बनी रही और ग्रीक , रोमन , मिस्र जैसी बडी सभ्याताओं-संस्कृति के मिट जाने के बाद भी बनी रही | अपनी ग्रहण शीलता और समावेशी प्रकृति के कारण भारतीय परम्परा-संस्कृति मोनोलिथिक यानी एक सतही नहीं अपितु बहु स्तरीय बहु वचनीय रूप में विकसित हुई | यह देश संस्कृति एक नदी की तरह प्रवाहमान नहीं है अपितु संस्कृतियों के एक सागर की तरह उपस्थित है | संस्कृति की उपमा या तुलना समुद्र में मूंगे की रीफ से की जा सकती है |समुद्र के भीतर रहने वाला यह नन्हा जीव समूह में अपना एक घर बनाते हैं और मर जाते हैं उनके बाद दूसरा समूह फिर तीसरा फिर चौथा ....और मूंगे की रीफ तैयार होती है |संस्कृति की रचना भी इसी तरह समूह दर समूह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है | किसी एक व्यक्ति,जाती ,वर्ग को इसकी रचना का श्रेय नहीं जाता | साथ ही संस्कृति गतिशील होती है | इसका एक स्थिर स्वरूप नहीं होता | इसने निरंतर टूट-फूट , घट-जोड़ बना रहता है |एक ही समय में वाद-प्रतिवाद उपस्थित देखे जाते हैं | धारा के साथ प्रतिधारा प्रवाहित रहती है | भारत जिस काल में एकेश्वर वाद था उसी कल में बहुईश्वरवाद भी फल फूल रहा था | सांख्य दर्शन के रूप में निरीश्वरवाद भी उपस्थित था जो सिर्फ प्रकृति और ईश्वर दो ही की सत्ता को स्वीकार करते थे | बौद्ध और जैन धर्मं भी अपनी तरह से अलग स्थापना दे रहे थे | भक्ति काल में देखे तो एक ही समय में सगुण और निर्गुण धारायें प्रवाहित थीं | देश में आर्य ,अनार्य , आदिवासी कई संस्कृतियाँ एक साथ गुन्थमगुथा रहीं और उनमे कोई भी प्रधान या गौण नहीं कही जा सकती | वे सभी भारतीय है और बराबर हैं |
कालांतर में इतिहास परम्परा संस्कृति सभी को सत्ता ने अपने हित में तोड़ना मरोड़ना और विकृत करना शुरू कर दिया | सन्दर्भ बदलकर उन्हें देखा जाने लगा और मनमानी व्याख्या का सिलसिला चल निकला | यहाँ तक की प्रभु की करुणाविगलित मुख मुद्रा बिगाड़कर भ्रू –भ्रकुटी कुपित कर दी गई |औद्योगिक क्रान्ति के दौर में पश्चिम में आर्थिक संरचना निर्धारी तत्व और संस्कृति को निर्धारक तत्व हो गयी थी | आज देश में राजनैतिक सत्ता निर्धारी तत्व की जगह लेती दिख रही है |
एंतोनियो ग्राम्शी की हेजोमनी हासिल करने में प्रतिगामी संस्कृति कामयाब हुई | पुनर्जागरण और स्वतन्त्रता संघर्ष के काल में संस्कृति के जिन मूल्यों का विकास हुआ था और प्रगतिशील व्याख्या की गई थी वे आज अपना चरित्र खोकर प्रतिगामी बनकर समय का रथ पीछे खीचने में लगे हैं |
ऊपर हमने भारत की जिस परम्परा का ज़िक्र किया है उसमे ऐतिहासिक शास्त्रार्थों का उद्धरण हैं लेकिन आज अगर कोई तर्क और न्याय की बात करे, तो उसे शास्त्रार्थ की उदार परंपरा की कड़ी मानने के बजाय लोग उसके खिलाफ चाकू तलवार त्रिशूल निकालने लग जाते हैं। ऐसी कट्टरता, और आक्रामकता से भारत जैसे विविधता वाले देश में एक वैचारिक परिपक्वता आने की संभावनाएं खत्महोती जा रही हैं और अब सार्वजनिक गाली-गलौज मार काट से यह लगता है कि पर आधारित लोकतंत्र से भारत अब बर्बर युग की तरफ लौट रहा है |
इसका सबसे बड़ा खामियाजा यह है कि ज्ञान और मीमांसा की प्रतिभायें मारी जा रही हैं और समाज प्रगतिशील मूल्यों से वंचित होकर सत्यम शिवं सुन्दरम से दूर होता जा रहा है |यह समय हमारे लिए चिंतन और कार्यवाही का है | संस्कृति को व्यापक और समावेशी बनाने का है |
कालांतर में इतिहास परम्परा संस्कृति सभी को सत्ता ने अपने हित में तोड़ना मरोड़ना और विकृत करना शुरू कर दिया | सन्दर्भ बदलकर उन्हें देखा जाने लगा और मनमानी व्याख्या का सिलसिला चल निकला | यहाँ तक की प्रभु की करुणाविगलित मुख मुद्रा बिगाड़कर भ्रू –भ्रकुटी कुपित कर दी गई |औद्योगिक क्रान्ति के दौर में पश्चिम में आर्थिक संरचना निर्धारी तत्व और संस्कृति को निर्धारक तत्व हो गयी थी | आज देश में राजनैतिक सत्ता निर्धारी तत्व की जगह लेती दिख रही है |
एंतोनियो ग्राम्शी की हेजोमनी हासिल करने में प्रतिगामी संस्कृति कामयाब हुई | पुनर्जागरण और स्वतन्त्रता संघर्ष के काल में संस्कृति के जिन मूल्यों का विकास हुआ था और प्रगतिशील व्याख्या की गई थी वे आज अपना चरित्र खोकर प्रतिगामी बनकर समय का रथ पीछे खीचने में लगे हैं |
ऊपर हमने भारत की जिस परम्परा का ज़िक्र किया है उसमे ऐतिहासिक शास्त्रार्थों का उद्धरण हैं लेकिन आज अगर कोई तर्क और न्याय की बात करे, तो उसे शास्त्रार्थ की उदार परंपरा की कड़ी मानने के बजाय लोग उसके खिलाफ चाकू तलवार त्रिशूल निकालने लग जाते हैं। ऐसी कट्टरता, और आक्रामकता से भारत जैसे विविधता वाले देश में एक वैचारिक परिपक्वता आने की संभावनाएं खत्महोती जा रही हैं और अब सार्वजनिक गाली-गलौज मार काट से यह लगता है कि पर आधारित लोकतंत्र से भारत अब बर्बर युग की तरफ लौट रहा है |
इसका सबसे बड़ा खामियाजा यह है कि ज्ञान और मीमांसा की प्रतिभायें मारी जा रही हैं और समाज प्रगतिशील मूल्यों से वंचित होकर सत्यम शिवं सुन्दरम से दूर होता जा रहा है |यह समय हमारे लिए चिंतन और कार्यवाही का है | संस्कृति को व्यापक और समावेशी बनाने का है |
!! हनुमंत किशोर !!
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