Friday, February 10, 2017

बाज़ार में संस्कृति और संस्कृति का बाज़ार

बाज़ार में संस्कृति
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“बहरहाल यह तुम्हारा तारा है
जिसे छोड़ दिया है उन्होंने तुम्हारे लिए
वे जिन्होंने तुम्हारे लिए
जगमगाता बाज़ार सजा रखा है
वे तुम्हारी इच्छाओं और रुचियों के नियंता
तुम्हारे भीतर जरूरत ही जरूरत जगाते
उस तारे को उन्होंने फालतू जान छोड़ दिया है
वह ब्लेक होल में बदल जाये उनकी बला से |”
(ज्ञानेंद्र पति : बाज़ार के विरुद्ध कविता )
कहा जाता है कि भारतीय दर्शन में जो कल तक माया थी आज वही बाज़ार है | जो कभी सेवक की भूमिका में था वही आज स्वामी की भूमिका में आ चुका है |
माया क्या है ? एक आभास जो वास्तविक होने भ्रम देता है | और व्यक्ति उस मरीचिका में भटकता रहता है बिना यह अहसास किये कि वह मरीचिका है |
इस माया का एक और उद्देश्य है सत्ता के हित में समाज को गैर जरूरी विषयों में उलझाये रखना | इसकी पहचान करते हुए जैसा विष्णु नागर कहते हैं "वे इन दिनों विलुप्त मंदिरों, विलुप्त नदियों / विलुप्त शत्रुओं ,विलुप्त मित्रों की खोज में व्यस्त हैं ताकि जो आँखों के सामने हैंउनका विलोपन किया जा सके।"
संस्कृति की माया बाज़ार की नयी माया है | बाज़ार में ब्रांड के रूप में स्थापित एक अति लोकप्रिय योग गुरु के जरिये इसे समझा जा सकता है | एक दूसरे उदाहरण में इसे ‘गंगा-साबुन’ के द्वारा समझें | कभी यही घर का ब्रांड साबुन था | हमारे घर में तब ‘गंगा’ का बड़ा आदर था ..जो आज भी है और उसका दर्जा देवी का था | आज भी जब तक राख-फूल गंगा की गोद में नही चले जाते मरने वाले को मुक्ति नहीं मिलती ऐसी घर की मान्यता है | आज भी नहाते समय हर लोटे को ऊपर उड़ेलते हुए गंगा को सप्त सिन्धु के साथ याद किया जाता है और ‘गंगा’ घर वालों लिए पाप मोचनी है |
तो उस जमाने में साबुन कम्पनी ने या दुकानदार ने या नाम के साम्य ने जाने कैसे यह विश्वास भर दिया कि इसको गंगा के पानी से बनाया गया है और नहाते समय लोग यह सोचकर इसे अपने शरीर पर मलते कि गंगा का जल इसी बहाने स्पर्श हो रहा है | गंगा साबुन से नहाने वाले के कितने पाप धुले होंगे इसका अनुमान तो नहीं लेकिन गंगा साबुन को बनाने वाले का मुनाफा खूब हुआ होगा इसका अनुमान सहज है |
बाद ने गंगा नामक ब्रांड का बोतल बंद पानी भी आया जिसका धार्मिककर्मकांड में गंगा जल की तरह इस्तेमाल हुआ | गंगा-जल का मामला उतना जटिल नहीं है जितना गंगा नाम के साबुन का |
कारण यह कि गंगा एक नदी है और साबुन नदी का सबसे बड़ा दुश्मन है | नदी में साबुन के निरंतर इस्तेमाल से मछलियाँ और अन्य जीव मरने लगते हैं | नदी के भीतर के जीवन की मृत्यु के साथ नदी भी मरने लगती है | यानी गंगा और साबुन इस तरह से बेमेल हुए | लेकिन बाज़ार अपने मुनाफे के लिए विपरीत की युक्ति जैसा चमत्कार करने से पीछे नहीं हटता | गंगा साबुन की तरह डेयरी प्रोडक्ट का एक ब्रांड है ‘कामधेनु’नाम का | सब जानते है काम-धेनु देवताओं की गाय है | देवता भले ना दिखे गंगा की तरह गाय दिखती भी है और परम्परा में में पूज्य भी है | भैंस भले गाय से ज्यादा दूध देती हो उसे गाय का दर्जा नहीं मिल सका लिहाजा उसके नाम से डेयरी प्रोडक्ट शायद ही हो | भले डब्बे में भैस के दूध का घी बेचा जाये डब्बे पर तस्वीर गाय की रहेगी | कारण बाज़ार हमेशा लोकप्रिय संस्कृति को भुनाता है वह इस क्षेत्र में नये का जोखिम तब तक नहीं लेता जब तक जोखिम में मुनाफे की गुंजाइश पैदा ना हो |
कुछ दिनों पहले एक अस्पताल में मेरा जाना हुआ | नाम था ‘चरक हॉस्पिटल’ | नाम अच्छा लगा तो मैंने वहां काम कर रहे एक दो लोगों से चरक के बारे में पूछा तो किसी को कोई जानकारी नहीं थी | चरक कुषाण राज्य के राज्य वैद्य थे आयुर्वेद के विशारद के रूप में जिन्होंने भस्म शोधन पर बड़ा काम किया था लेकिन उनके नाम का जो हास्पिटल है उसका आयुर्वेद या चरक की चिकित्सा से कोई सम्बन्ध नहीं है | यह सिर्फ जन मानस में बसी चरक की स्मृति और विश्वास को अपने मुनाफे के लिए इस्तेमाल करने का हथकंडा मात्र हो सकता है, बाज़ार जिसमे पारंगत है | बिकने की गरज से यह गधे को बाप बनाने से भी चूकता |
बाज़ार का मानदंड सिर्फ इतना है,जो बिकाऊ है वही टिकाऊ है | यदि बाज़ार का विरोध भी बिकाऊ हो तो बाज़ार उसका विपणन करने में सबसे आगे होगा | यही कारण है की बाजार में विक्रय पटल पर कला –संस्कृति- साहित्य में मौजूद बाज़ार विरोधी विचार भी शेयर मार्केट के पत्रिका के साथ बराबर से नज़र आते है | बाज़ार के लिए वो विचार , विचार नहीं महज एक पण्य है ..वस्तु जिसके बदले में मुनाफा कमाया जा सकता है | हमारे जीवन में जो भी शुभ है वह वहां वस्तु है अन्यथा है ही नही |
बाज़ार सिर्फ यह देखता है कि कहाँ व्यापार की सम्भावना है? फिर वह चाहे धर्म या संस्कृति का ही क्षेत्र क्यों ना हो | वह निरंतर आखेटक की मुद्रा में रहता है और अपने लिए नये-नये क्षेत्र खोजता रहता है |प्राचीन काल में कृषिप्रधान समाज में उसकी सम्भावनाओं का क्षेत्र सीमित था | कालान्तर में औद्योगिक क्रान्ति ने जब बुर्जुआ और मध्य वर्ग को जन्म दिया जो अपनी जड़ो से उखड़कर नगरों में आबाद हुए तो बाज़ार के लिए संस्कृति का नया क्षेत्र भी खुल गया | क्योंकि यह मध्यवर्ग अपनी पहचान,परम्परा और संस्कृति से रूमानी तौर पर तो जुड़ा था लेकिन उसके प्रतीकों तक पहुँचने के लिए संसाधन और समय उसके पास ना होने से उनके लिए वह बाज़ार पर पूर्णत: निर्भर होता चला गया | बाद में गाँव विस्थापित हुए और नगर मध्यवर्ग के साथ निचले तबके का भी ठिकाना बन गया | जिसे अपने प्रतीकों तक पहुचने की सुविधा और साधन नहीं थे और इसके लिए वो बाज़ार पर आश्रित होता गया | इसी विडम्बना ने बाज़ार के लिए आधुनिक युग में संस्कृति का सबसे बड़ा इलाका खोल दिया |
इसे हाल ही मै ‘करवा-चौथ’ के बाज़ार से समझा जा सकता है | कभी औरते मिलकर मिटटी का करवा बनाया करती थीं और एक दूसरे को मेहदी रचाया करती थी | अब करवा और मेहदी दोनों ही बाज़ार की गिरफ्त में हैं | बाज़ार से ही करवा खरीदे जाते हैं जिन्हें कभी औरते मिटटी से खुद तैयार करती थीं और बाज़ार से ३०० से ५०० रूपये तक में मेहदी लगवा ली जाती है जिसे कभी औरते आपस में एक दूसरे को रचा करती थीं | साथ ही ज्वेलरी और पार्लर का बड़ा व्यवसाय भी इस त्यौहार में देखा जाता है जो अब लगभग हर त्यौहार का हाई लाईट बन चुका हैं |
हमारी संस्कृति त्यौहार और पर्व प्रधान संस्कृति त्यौहार प्रधान रही है तो त्यौहार के मूल में प्रतीकवाद की लोक अवधारणा हैं | | इनके बहाने लोक अपने मूल्यों का स्मरण करता है और अपनी परम्परा से जुड़ता है | लेकिन बाज़ार हर त्यौहार को सिर्फ उत्सव यानी खान-पान, कपड़े-ज्वेलरी,धूम-धड़ाके ताम-झाम में बदल देता है | इसी में उसका मुनाफा जो होता है | यह बदलाव हमारे अवचेतन में घुसकर धीरे धीरे किया जाता है | जैसे “कुछ मीठा हो जाये” | अब मीठा हमारी संस्कृति में हर शुभ और प्रसन्नता के मौके से जुड़ा हुआ है और लोक व्यंजन से उसका सम्बन्ध है | भारत जैसे संस्कृति बहुल देश में इसका अपना आनन्द भी है | लेकिन एक चाकलेट कम्पनी हमारे अवचेतन में घुले इस मीठे को अपने प्रोडक्ट से रिप्लेस कर देती है और मीठा मतलब केडबरी हो जाता है
| जन्म दिन हो २६ जनवरी हो या कोई सामाजिक त्यौहार गिफ्ट पेक से लेकर स्वागत की तश्तरी तक सबमे मीठे की जगह चाकलेट लेता जा रहा है | धार्मिक उत्सवो के भंडारे जो साथ खाना बनाने,साथ खाना खाने के बहाने हमारी सामाजिकता का हेतु हुआ करते थे वहां भी सड़क किनारे आइसक्रीम के पैकेट बांटकर उनका अनर्थ किया जा रहा है | बाज़ार के दवाब में धार्मिक और सामाजिक त्यौहार दिखावे का निर्लज्ज प्रदर्शन बनकर रह गये है | त्यौहारो का मूल आधार है सहभागिता और सहकार जबकि बाज़ार प्रतिस्पर्धा पर टिका होता है | त्योहारों के भीतर बाज़ार के प्रवेश ने त्योहारों को भी प्रतिस्पर्धा बना दिया है | जिसे हम नवदुर्गा की झांकियों में बढ़ चढ़ कर होने वाले प्रदर्शनो के रूप में देख सकते हैं | शहर में व्यापारियों के मंडल इन आयोजनों की चालक शक्ति बनकर प्रथम-द्वितीय पुरूस्कार आदि के माध्यम से बाज़ार का त्यौहार में प्रवेश सुनिश्चित कर रहे हैं | दही हांडी और गरबा जैसे उत्सव भी टिकट लगाकर आयोजित किये जाने लगे है | गरबा में जहाँ पार्लर-गारमेंट्स-ज्वेलरी का सयुंक्त व्यापार फलता फूलता है वहीं उसमे टिकट लगाकर उसे एक सांस्कृतिक उत्सव से हटकर पूरी तरह मुनाफा केन्द्रित गतिविधि में बदल दिया गया है |ऐसे ही एक गरबा आयोजक घाटकोपर गुजराती समाज के सचिव जिग्नेश खिलनानी का कहना है "हम पूरी तरह प्रायोजकों पर निर्भर हैं. अगर हम 500-1000 रुपये का टिकट रखेंगे तो पास के लिए 3000 रुपये लेने वालों का मुकाबला कैसे करेंगे? हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?” यानी संस्कृति शुद्ध कारोबार बन चुकी है |
मुनाफा या लाभ अपने में ऐतराज का विषय नहीं है लेकिन भारतीय परम्परा में लाभ से पहले शुभ आता है | जिस लाभ के पहले शुभ ना हो वह अवांछनीय है | लेकिन जिस बाज़ार के लिए लाभ ही एक मात्र शुभ हो वह इसकी परवाह नहीं करता | यहाँ मनुष्य मनुष्य नहीं मात्र उपभोक्ता रह जाता है | ममता कालिया का लघु उपन्यास है “दौड़” | जिसमे वे बाज़ार और केरियारिज्म के दवाब में चटकते सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों की दास्तान कहती हैं | उसका एक पात्र कहता है -“पापा मेरे लिए शहर महत्त्वपूर्ण नहीं है, कैरियर है। अब कलकत्ते को ही लिजिए। कहने को महानगर है पर मार्केटिंग की दृष्टि से एकदम लद्धड़। कलकत्ते में प्रोड्यूसर्स का मार्केट है, कंज्यूमर्स का नहीं। मैं ऐसे शहर में रहना चाहता हूँ जहाँ कल्चर हो ने हो, कंज्यूमर कल्चर जरूर हो। मुझे संस्कृति नहीं उपभोक्ता संस्कृति चाहिए, तभी मैं कामयाब रहूँगा।“
इस सांस्कृतिक विचलन को हरिशंकर परसाई ने बहुत पहले ताड़ लिया था | अपने एक लेख में वे कहते हैं –“किसी दिन कबीरदास मफतलाल के विज्ञापन में होंगे और कहेंगे जो कपड़े मै बुनता हूँ वो नहीं पहनता ..मै मफतलाल के कपड़े का अंगरखा पहनता हूँ |”
कल का यह व्यंग्य आज सच होता दिख रहा है जब मद्य-निषेध के कट्टर समर्थक महात्मा गांधी की भी छवि भुनाने में वाइन ब्रांड को मुनाफा नज़र आता है | याद करे परमाणु परीक्षण को हँसते हुए बुद्ध का टेग खुद सरकारी स्तर पर लगाया जा चुका है | वह मूल्य पतित समय की बानगी है |
लेकिन त्रासदी इतनी भर होती तो भी गनीमत थी | असल त्रासदी यह है जिसका संकेत ममता कालिया के उपन्यास दौड़ में अंत में मिलता है ,जब मिस्टर सोनी की हार्ट अटैक से मृत्यु हो जाती है और विदेश जा बसा उनका लड़का सिद्धार्थ दाह संस्कार के लिए बुलाये जाने पर अपनी माँ से कहता है –“हम सब तो आज लुट गए ममा। लोग बता रहे हैं मेरे आने तक डैडी को रखा नहीं जा सकता। आप ऐसा कीजिए, इस काम के लिए किसी को बेटा बनाकर दाह-संस्कार करवाइए। मेरे लिए तेरह दिन रुकना मुश्किल होगा।” वो आगे विदेश की मिसाल भी देता है जहां मुर्दा-घर में शव रखा रहता है और बच्चों को जब फुर्सत मिलती है जाकर उनका अंतिम संस्कार कर देते हैं |
यह उपन्यास कोई बीस बरस पहले का है | महानगर की यह विडम्बना अब गाँव गाँव तक पहुँच चुकी है | देश अब एक बाज़ार बनता जा रहा है | जहां सामाजिकता के ताने जन्म और मृत्यु के सारे संस्कार बाज़ार के हवाले हो चुके हैं | सोशल मीडिया पर एक विज्ञापन अभी चर्चा में था हो सकता है वह मज़ाक हो लेकिन उसके निहितार्थ दूरगामी हैं | विज्ञापन में अंतिम-संस्कार के लिए भाड़े पर शामिल शव यात्रियों तेरही आदि के रेट बताये गये थे |
जिन संस्कारों को नये जमाने में ढोया नहीं जा सकता बाज़ार उन्हे लोक परलोक से जोड़कर पहले हमारे लिए अपरिहार्य बनाता है फिर हमारी ओर से उनका ठेका लेकर हमारी जेब काटने लगता है |
इस तरह हमारी संस्कृति हमारे सपने यानी जो बाज़ार का प्रतिवाद रच सकते थे अब खुद बाज़ार के कब्ज़े में हैं | राजेश जोशी जैसा एक कविता में कहते हैं “
बाजार पहले ही चुरा चुका था हमारी जेब में रखे सिक्को को
और अब सौदा कर रहा था
हमारी भाषा हमारे सपनों का
बाज़ार से उनकी मुक्ति ही हमारी मुक्ति है ||
||हनुमंत किशोर ||

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