Tuesday, March 4, 2025

हमारे समय में स्त्री.. चार कविताएं

 हमारे समय में स्त्री :तीन कविताएं .

++++++++++++

1)

एक 

थकी हुई सुबह

एक 

ऊबी उदास दोपहर 

एक 

लिथड़ी हुई सांझ

एक

टूटकर बिखरी रात

कविता में

ना सुनना चाहे तो

सीधे-सीधे कहूँ

" हमारे घरों की औरतों .."

2)

गांधारी होने के लिए 

आंखों पर पट्टी बांधना ही जरूरी नहीं था 

खुली आंखों से भी गांधारी हुआ जा सकता था 

ये मै अपनी मां को देखकर समझ सकता था 

गांधारी का ये रूप 

ज्यादा बेचारगी भरा था ..


3)

 पाँव

+++++++

जानेमन 

तुम्हारे पाँव बहुत खूबसूरत हैं

मखमली संगमरमर पर नही

तुम रखती हो इन्हे खुरदुरी पथरीली ज़मीन पर


तुम्हारे चेहरे से नहीं

तुम्हारे पाँवो से खुलते हैं

तुम्हारी ज़िंदगी के राज़

जब कभी ज़िंदगी पे प्यार आता है

तुम्हारे पाँवो को चूमने का जी होता है बहुत


.इन्हे देखकर ही समझ आता है कि

क्यों समय की शिला पर चेहरे नही,पाँव दर्ज़ होते हैं ?

और कैसे कुछ चेहरों की कागज़ी खूबसूरती के लिये

 बेहद बदसूरत होना पड़ता है कई कई पाँवों को ?


तुम्हारे पांवों से मिलती हैं मौसम की सब निशानदेही 

जैसे बिवाइयों की दरारों में छिपा होता है ठिठुरता माघ

और अँगुलियों के बीच ग़लती चमड़ी

गवाही देती है रसोई में घुसे बारिश के पानी की.. 

फूटते हैं जब पाँवों के छाले तो ठंडा जाती हैं

जेठ में धरती की तवे सी तपती पीठ ..


तुम्हारे पाँव असमाप्त कविताएँ हैं

जो संघर्ष के एक सिरे से 

संघर्ष के दूसरे सिरे तक अविराम फैली हैं

तुम्हारे पाँवो के जरिये कुदरत मौत का विलोम रचती है ....


मज़ाक में न लो इसे तो कहूँ

ज़िंदगी पे जब भी प्यार आता है

तुम्हारे पांवों को 

चूमने को जी होता है बहुत..


4)

आठ मार्च

+++++++

सात मार्च की ही तरह आया आठ मार्च ..

आज  के दिन भी 

‘ वे’ पौ फटने के पहले उठीं

बच्चों को स्कूल के लिए तैयार किया

पति को बिस्तर पर चाय दी

और घर के सब काम निपटाकर 

अपने काम पर निकल गयीं

फिर काम से लौटी और काम पर लग गयीं ..

आज के दिन भी ‘वे’ कोचिंग से आकर सीधे किचन में घुसीं

उधर भइया सौफे पर किताबे फेककर दोस्तों से मिलने निकल गया ..

आज भी ‘वे’ आफिस, स्कूल, बाज़ार में अजीब तरह से घूरी गयीं

और निगाह बचाकर तेज़ी से निकल गयी ..

आज के दिन भी वे दान की वस्तु समझा गयीं

और खानदान के सम्मान के लिये तहखानो में डाल दी गयीं |

आज के दिन भी उनका गर्भ में ही आखेट किया गया |

आज के दिन भी उन्होंने पति की झूठी थाली में ‘पुण्य’ की तरह खाया

और पति की लात को 'प्रसाद' समझकर चुप हो गयीं ..


जब कभी उनके हलक से आवाज निकली 

उनकी बेड़ियों को खोलकर

उनके गले में हार की तरह डाल दिया  गया

और वे चौराहों पर पूज्य प्रतिमाओं की  तरह स्थापित कर दी गयीं ..


इस आठ मार्च  की चुसनी की जगह ,

उन्हें संतरे की गोली दे दो

कम से कम उनका स्वाद तो बदल जायेगा ..

*हनुमंत किशोर*

Friday, September 6, 2024

जंजीर


१)
ज़ंजीर
खोले जाने के बाद भी
वे आगे नहीं बढ़े
वे इतने सालो में
चलना भी भूल गये थे ..
२)
लोहे की
मोटी ज़ंजीर के बदले
सोने की
पतली ज़ंजीर से बचना
उसे तुम तोड़ सकते हो
इसे तुम
तोड़ना नहीं चाहोगे ...||

Tuesday, August 30, 2022

बिलकिस बानो का दर्द और हम

बिलकिस बानो का दर्द और हम 

******* **

अभी कुछ दिन पहले ही ए के हंगल साहब के एक फिल्मी  डायलाग का कई लोगो ने हवाला दिया  " इतना सन्नाटा क्यों है.. भाई " संदर्भ था बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई पर हमारी चुप्पी का । 

परसों ही राजदीप सरदेसाई का दैनिक भास्कर में लेख था जिसमे उन्होंने स्वयं को दी गई सलाह का उल्लेख किया है जो कुछ ऐसी थी कि बीस साल पीछे छूट गई बात को आप भी छोड़ दीजिए ।

तो सच है सन्नाटा पसरा हुआ है लेकिन कुछ हैं जो सन्नाटे को तोड़ रहे हैं इस ताकि सन्नाटा उनके सच कहने के साहस को ना तोड़ दे । सच का विवेक अपने आप में मुक्कमल बात नही है जब तक सच कहने का साहस ना हो ।

ऐसे ही विवेक पूर्ण साहस का परिचय हिंदी साहित्य के विद्यार्थी "ओशो तिवारी ", की इस पोस्ट से मिला जो साझा करने से मैं रोक नही पा रहा ...


"ओ निर्भया!

कभी कभी सोचता हूं कि तुम यहीं हो ,किसी अभिशप्त आत्मा- सी भटक रही हो।यहीं बिल्कुल यहीं किसी गाँव में , किसी कस्बे के मोहल्ले की किसी सुनसान सड़क पर या किसी ट्रेन या बस में, या अपने कहे जाने वाले घर में या राजपथ पर या फिर समूचे देश में।मुझे तुम हर जगह नज़र आ रही हो। टूटी,परित्यक्त,बिखरी और चिरकाल तक भटकने को अभिशप्त।

कुछ तुम जैसी और हैं जो जीते जी अभिशप्त हैं जो अभी तक आत्माएँ नहीं बनी हैं । नाम बस बदल गए हैं। तुम जैसी और उन करोड़ों आत्माओं के तर्पण के लिये हमने तुम्हारे ही कातिलों  पर हार सजाए हैं। तुम्हारी सदा की कडवाहट को मिटाने के लिए उनका मुँह मीठा किया है। कैसा लग रहा होगा तुम्हें यह सब देखकर ? कुछ हो न हो पर तुम शान्त ज़रूर  हो गयी होगी। शायद अब भटकने की ज़रूरत न पड़े। एक समाज ने तुम्हे ऐसे ही श्रद्धांजलि दी है । अब भटकाव ठीक नहीं है क्योंकि सब कुछ कानून/विधिअनुसार हुआ है। इसमे देश के बड़े बड़े पंडित पुजारियों ने अपना सहयोग दिया है।

अब तुम भटकना छोड़ शान्त हो जाओ। क्योंकि चारों तरफ सन्नाटा है। तर्पण संपन्न हुआ है। सब चुप हैं ।

और मैं शर्मिंदा हूँ । नि:शब्द हूँ । 

#बिल्किस बानो

-ओशो उत्सव"

#बिलकिस बानो का मामला ये था कि सन दो हज़ार दो में  गोधरा काण्ड के बाद गुजरात में भीषण दंगे भड़क उठे थे । कई परिवार सुरक्षित ठिकानों की तलाश में इधर से उधर छुपते छुपाते भाग रहे थे । ऐसा ही एक परिवार था बिलकिस बानो का जो तीन मार्च दो हजार दो को दंगाइयों की चपेट में आ गया ।

बिलकिस बानो की उम्र थी इक्कीस बरस और वो पांच माह के गर्भ से भी थी जब उसके साथ दंगाइयों ने सामूहिक बलात्कार किया और उसकी तीन बरस की बेटी समेत परिवार के सात लोगो की हत्या कर दी गई । हत्या तो और भी लोगों की करनी बताई गई थी लेकिन छः लाशे बरामद नही हुई इसलिए मामला इतनी ही हत्याओं का पेश हुआ । जांच में  पी एम रिपोर्ट बदलने जैसे संगीन आरोप थे इसलिए मामला सी बी आई को सौंपा गया सी बी आई की मुंबई की विशेष अदालत ने लम्बे मुकदमें के बाद  सन दो हजार आठ में तेरह में से ग्यारह आरोपियों को हत्या और बलात्कार के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाई । अपील में माननीय बाम्बे उच्च न्यायालय और फिर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी सज़ा को बरकरार रखा ।

हाल ही में  पंद्रह अगस्त को गुजरात सरकार ने अच्छे चाल चलन के आधार पर इन अपराधियों की सजा माफ करते हुए इन्हे रिहा कर दिया ।

कानून सजायाफ्ता को इस तरह माफ करने का अधिकार सरकारों को देता जरूर है लेकिन सवाल है माफ़ी कब और किसे?

इसी सवाल पर माननीय उच्चतम न्यायलय में पिटिशन दाखिल है जिस पर सरकारों को नोटिस जारी हुए हैं ...!!

Monday, March 25, 2019

सत्य का पहरुआ : गणेश शंकर विद्यार्थी



सत्य का पहरुआ : गणेश शंकर विद्यार्थी 
______________________________
29 मार्च 1931 को कानपुर अस्पताल के पास एक लाश मिलती है जो फूली हुई और सड़ांध ले चुकी थी ।जिसकी शिनाख्त बाद में साप्ताहिक 'प्रताप' के यशस्वी सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी के रूप में होती है ।
पता चलता है कि 25मार्च 1931 को कानपुर में भड़के हिन्दू मुस्लिम दंगे के दौरान दंगे को शांत करने की कोशिश में उन्होंने अपनी जान होम कर दी थी ।
दो दिन पहले देश के तीन सपूत भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव अंग्रेजी हुकूमत द्वारा सूली चढ़ाए गए थे ।इसे लेकर देश मे जो जो विक्षोभ था उससे ध्यान बटाने के लिए तब हिन्दू मुस्लिम दंगा अंग्रेजो की सस्ती और सुलभ रणनीति थी ।
लेकिन यदि आज की पत्रकारिता को देखे जहां मीडिया आग में घी डालकर तेज़ हुई आंच में अपनी रोटी सेंकने का काम करता है वहां कोई भी नासमझ पूछ बैठेगा कि विद्यार्थी जी को आखिर पड़ी क्या थी जो वे आग में कूदकर आग बुझाने चल दिए ?
लेकिन अव्वल तो विद्यार्थी जी आज की कर्मिशयल और टी आर पी मारी मीडिया की पैदाइश नही थे जो अपना फर्ज भूल जाते और दूसरे उनका संस्कार साहित्य से आया था । उन्होंने पत्रकारिता को आजीविका का माध्यम नही अपने विचारों का मिशन बनाया था ।
शुरुआत 1911 में हुई थी तब जब हिंदी साहित्य की मूर्धन्य पत्रिका 'सरस्वती'के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें बुला भेजा था और वे महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक हुए थे । 
'सरस्वती' से 'अभ्युदय' और फिर 'प्रताप'।
इसी 'प्रताप' को उन्होंने अपना पर्याय बना लिया और लोगों के बीच 'प्रताप बाबा'कहलाये ।
पांच बार जेल गए । 
'प्रताप'में काम करते हुए मानहानि से लेकर राजद्रोह तक के मुकद्दमे झेले लेकिन 'कलम' की धार और रफ्तार कम नही होने दी । क्षत शीश हुए लेकिन कलम को नत शीश नही होने दिया ।
25 मार्च को जब कानपुर में दंगे भड़के तो कलमकार को अपनी भूमिका का अहसास हुआ ।
अब समय डेस्क पर बैठकर कागज़ रँगने का नही ..जनता के बीच पहुँचकर उसके विवेक को जगाने का है ।
और जब वे अविवेकी जनता को मनुष्यता का पाठ समझा रहे थे ,धर्मान्ध भीड़ ने सत्य और मनुष्यता के इस पहरुए की हत्या कर दी ।
जिसके शव की शिनाख्त चार दिन बाद हुई ।अमृत लाल नागर ने कहा 'वे अपने ही घर मे शहीद हो गए '
गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकार होने के नाते सत्य का पहरूआ मानते थे। उनके अनुसार सत्य प्रकाशित करना और उसे उजागर करना ही पत्रकार का धर्म होता है। एक जगह वे कहते हैं -
‘‘मैं पत्रकार को सत्य का प्रहरी मानता हूं-सत्य को प्रकाशित करने के लिए वह मोमबत्ती की भांति जलता है।"
आज बहुत कम लोग हैं जो अपने कहे पर ईमान ला सकते हैं जैसा कि विद्यार्थी जी लेकर आये ।
मोमबत्ती नही वे तो मशाल की तरह आज के धर्मान्ध और अंध राष्ट्र वाद के भयावह दौर में जल रहे है । पथ प्रशस्त कर रहे है ।
उनकी बहुत सी बाते आज अधिक चरितार्थ होती दिख रही हैं ।1925 में तब के नेता बनारसीदास चतुर्वेदी जी को फटकारते हुए उन्होंने कहा था -"मै हिन्दू मुसलमान झगड़े का मूल चुनाव को समझता हूं ..चुने जाने के बाद आदमी देश और जनता के काम का नही रहता ।"
धार्मिक आडम्बर को फटकारते हुए एक जगह वे कहते है 
"अजान देने शंख बजाने नमाज पढ़ने का मतलब धर्म नही है ।..अच्छे आचरण करने वाले नास्तिक का दर्जा धर्म के नाम पर उत्पात मचाने वालो से ऊंचा है ।"
महात्मा गांधी की तरह उनका मुख्य जोर धर्म के आध्यात्मिक मूल्यों पर था । स्वयम को वे धर्म परायण कहते थे ।लेकिन उनकी दृष्टि में राष्ट्र धर्म सभी धर्म से ऊपर था । एक जगह वे कहते है 'हिन्दू हिन्दू राष्ट्र चिल्लाने वालों ने अभी तक राष्ट्र का मतलब नहीं समझा'
एक अन्य जगह खिलाफत आंदोलन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा ‘देश की आजादी के लिए वह दिन बहुत ही बुरा था जिस दिन आजादी के आंदोलन में खिलाफत, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान दिया जाना आवश्यक समझा गया.’ ये बात उस खिलाफत आंदोलन के खिलाफ में कही गयी थी जिसे तुर्की के खलीफा के समर्थन में महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम समुदाय को साथ लाने के एक मौके के रूप में देखा था.ये साहस ये विवेक गणेश शंकर विद्यार्थी में ही सम्भव था जो उस समय महात्मा गांधी के कार्यक्रम की रचनात्मक आलोचना कर कह सके कि ये कार्यक्रम आज़ादी के आंदोलन को एक कदम पीछे ले जाने जैसा है ।
पत्रकारिता को जन चेतना ,जन शिक्षण का माध्यम बनाने वाले सत्य के पहरुए और मनुष्यता के मशालची राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रासंगिकता  वर्तमान 
दौर में और भी ज्यादा हो गयी है |(हनुमंत किशोर )

Thursday, November 8, 2018

कला की सार्थकता


कला की सार्थकता
+++++++++++++ -# हनुमंत किशोर
“कलाकार का असली काम मनुष्य के द्वारा मनुष्य के खिलाफ किये जा रहे षड्यंत्र को उजागर करना है |”
‘जैनुल आबेदीन’
कला क्या है ?
ये प्रश्न शायद ही कोई कलाकार अपना काम शुरू करने के पहले या अपना काम करने के दौरान पूछता हो | लेकिन ये प्रश्न उसकी कला के सम्पूर्ण होते ही ये प्रश्न तात्विक हो उठता है और  साथ ही कई अन्य प्रश्न भी जैसे कि क्या कला जीवन की अनुकृति है या जीवन की विवेचना है ?
क्या कला स्वांत सुखाय है या सामाजिक प्रभाव से प्रभावित होकर कलाकार के द्वारा किये गये सामाजिक कर्म से उद्भूत  एक सामाजिक उत्पादन है ?
एक सच्चा कलाकार सजग होता है और सजगता के साथ अपनी कला में वो इन प्रश्नों के उत्तर तलाश करता है | कवि , आलोचक मुक्तिबोध के मुहावरे में कहें तो वह ज्ञानात्मक सम्वेदन है | उसकी तन्मयता भले ‘बेखुदी’ में ले जाती हो लेकिन होशो हवास में ही चेतना पर उसका अवतरण होता है |
इस तरह से कला कला प्राणी जगत में मनुष्य मात्र का उत्पादन है | एक ऐसे मनुष्य का जो अपने होशो हवास में यथार्थ का साक्ष्तात्कार करता है और उसे एक माध्यम से निरुपित करता है | और यही उसकी कला है |
मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी में हम कला का दर्शन नहीं कर सकते हालांकि पक्षी के कलरव को हम गान भी कहते हैं और मोर के झूमने को नाच भी लेकिन ये इन प्राणियों की प्राकृतिक जैविक कार्यवाहियां हैं | ना कि स्वयं की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सीखी गयी , विकसित की गयी कला |
इस तरह कला जैविक या प्राकृतिक कार्यवाही ना होकर अभिव्यक्ति का  एक सीखा गया  और विकसित किया गया माध्यम है |
यानी सीधे सीधे कहें तो कला प्रकृति का नहीं संस्कृति का व्यवहार क्षेत्र है  |  एक तरह से सांस्कृतिक घटक है |
 जैसे जैसे संस्कृति विकसित और परिवर्तित होती गयी कला में भी विकास और परिवर्तन सहज घटित होता चला गया | लेकिन ये संव्यवहार एक तरफ़ा ना होकर दुतरफा है यानी जहाँ कला सांस्कृतिक , सामाजिक , ऐतिहासिक परिवेश से प्रभावित हुई वहीँ उसने भी  ऐतिहासिक और सामाजिक परिवेश को प्रभावित किया | इन परिवर्तनों में कभी उसकी भूमिका अवरोध की तो कभी उत्प्रेरक की रही | जैसा कि एल्बर्ट ह्ब्बार्ट कहते हैं “ कला कोई वस्तु नही , तरीका है|”
इस पूरे विमर्श को कला की उत्पत्ति और विकास के अवलोकन से समझा जा सकता है |
कला के प्राचीनतम रूप हमे गुफा भित्ति चित्रों में मिलते हैं | दुनिया भर में फैली ये गुफा भित्ति चित्र कोई दस हज़ार से लेकर एक लाख साल तक पुराने  हैं यानि होमो इरेक्टस मानव से शुरू होकर नियोलिथिक काल तक |
भारत में भीमबैठका और नरसिंह गढ़ के गुफा भित्ति चित्र सबसे प्राचीन है | इनका वर्णन कला की उत्पत्ति और सार्थकता को व्यंजित करता है | भीम बैठका के चित्रों में हम आखेट काल के मनुष्य के संघर्ष , साहस और उल्लास को देख सकते हैं | तीर भाले से जानवर का शिकार करते ये मनुष्य जिजीविषा , संघर्ष और दक्षता के विम्ब हैं | नरसिंह गढ़ के भित्ति चित्रों में हम इन्हें हिरण की खाल सुखाते हुए देखते हैं | ये पाषाण काल था |
लेकिन जब कृषि युग की शुरुआत हुई और वन जीवन ग्राम जीवन में बदल गया | सामाजिक जीवन के नियमन और जिज्ञासाओं के समाधान के लिए सांस्थानिक धर्म  अपनी भूमिका में आ गया तब अजन्ता और एलोरा के गुफा भित्ति चित्र में बुद्ध और जातक कथाएं चित्रित हुई |
परिवर्तन और विकास यहीं नहीं रुका बौध धर्म के पराभाव के बाद बने तंजोर राजराजेश्वरी मन्दिर में नृतकी के भित्ति चित्र में शैली ही नहीं बदली बल्कि विषय-वस्तु में भी बदलाव साफ़ साफ़ देखा जा सकता है | मुग़ल काल में भित्ति चित्रों का स्थान महल की नक्काशियों ने ले लिया , जहां भारतीय शैली में फ़ारसी शैली का प्रभाव साफ परिलक्षित होता है |
आधुनिक काल में ये भित्ति चित्र म्यूराल की शक्ल हमारे समय की सबसे सशक्त आलोचना बनकर सामने आते हैं | यूरोप में माइकल एंजेलो , राफेल और लियोनार्ड विन्ची के म्यूराल प्रबोधन काल की पूर्व पीठिका रचते हैं |
बात जब आदिम काल से आधुनिक काल के  भित्ति चित्रों के बहाने कला की प्रासंगिकता को चिन्हित करने की हो तब पाब्लो पिकासो की म्यूराल पेंटिंग ‘गुएर्निका’ का सन्दर्भ जरूरी हो जाता है जो युद्ध के विरुद्ध कला का एक सार्थक वक्तव्य और हिंसा के विरुद्ध कला के एक कारगर हस्तक्षेप के रूप में सदियों याद किया जाता रहेगा | १९३७ में कैनवास पर आयल पेंट से बने इस म्यूराल में नाजी जर्मन और फासिस्ट इटली के दौर में बमबारी से तबाह हुए स्पेन के एक गाँव ‘गुएर्निका’ की  बर्बादी का मंज़र है | इसमें श्वेत-श्याम और धूसर रंग से खंडहर की पृष्ठभूमि में सांड , घोड़े और क्षत-विक्षत शव के जरिये एक विलाप रचा गया है | ऊपर जलता एक बल्ब और नीचे टूटी तलवार काव्यत्मक व्यंजना देती हैं | जब एक ‘गेस्टापो’ ने इसे देखते हुए पिकासो से पूछा “ ये आपने बनायी है ?”
पिकासो ने कहा “ नहीं ...आपने बनायी है”
कला यही करती है यानी सत्ता के पाखंड को उजागर करते हुए उसका प्रतिपक्ष रचना | सच्ची कला हू ब हू नकल नहीं करती बल्कि आंदोलित करती है |
‘गुएर्निका’ हमे हमारे दूसरे प्रश्न का उत्तर भी देती है कि क्या कला जीवन की अनुकृति है या जीवन की विवेचना है ?
‘गुएर्निका’ में कहीं भी सीधे- सीधे युद्ध का कोई दृश्य नहीं है | कोई भी बम वर्षक विमान नहीं | कोई गेस्टापो कोई हिटलर कोई मुसोलनी नहीं | लेकिन फिर भी ये उनके विरुद्ध एक वक्तव्य इसलिए बन जाती हैं क्योंकि यह युद्ध की अनुकृति या नक़ल नहीं उसका विवेचन है | जिसकी त्रासदी क्षत-विक्षत शव नुमा आकृतियों के विलाप से ध्वनित होती है | समीक्षक जिसे विलिंग सस्पेंशन ऑफ़ डिस्बीलीव कहते हैं वो यहाँ नहीं है है | जैसा कि ब्रेख्त के एपिक थियेटर में किसी तरह का सम्मोहन , मायाजाल रचने के द्वारा दर्शक की चेतना को सुलाने के स्थान पर उसे मायाजाल से काटकर उसकी चेतना को जागृत करने और सोचने  के लिए मजबूर करने प्रयास किया जाता है | ‘जीवन की अनुकृति’ अरस्तू के ‘पोएटिक्स’ में वर्णित कैथारसिस यानी विरेचन सिद्धांत का अनुसरण करते हुए अपना एस्थेटिक रचती है | कला के इतिहास में उसका स्थान और उपयोगिता निर्विवाद है | अरस्तू के सिद्धांत के आलोक में एसीकिलस, सोफ़ोक्लेस और यूरीपिडस की ग्रीक त्रासदियों में हमारी दमित इच्छायें और सुप्त भय निकास का मार्ग भले पाते हो लेकिन कला का वास्तविक कार्य इससे आगे जाते है जब वह इन त्रासदियों के लिए दायी शक्तियों का विवेचन कर हमे उनके विरुद्ध सतर्क करती हैं |
कला की यही भूमिका और शक्ति है जो अरस्तू के गुरु प्लेटो को आतंकित करती है और वे अपने ग्रन्थ रिपब्लिक में वर्णित आदर्श राज्य से सभी कवियों ,कलाकारों को खदेड़ देने की पैरवी करते हैं | प्लेटों के मत में कवि ,कलाकार अराजक होते हैं और वे आदर्श राज्य के लिए खतरा हैं | यहाँ एक हद तक प्लेटो सही भी हैं क्योंकि कला अपने को अभिव्यक्त करने के दौरान पानी की तरह होती है यानी बंधे बंधाये ढर्रे से जब वह अपना मार्ग नहीं पाती तो जिधर से पाती है अपने निकास का रास्ता बना लेती है | इस क्रम में वह हर संस्कृति या मूल्य का निषेध कर जाती है |वह हर क़ानून का अतिक्रमण कर जाती है | वह तब स्वयम सर्वोच्च विधेयक होती है | अभिव्यक्ति के दवाब में उसके सामने तब श्लीलता –अश्लीलता के प्रश्न गौण हो जाते हैं | वैसे भी ये समय और संस्कृति सापेक्ष प्रश्न हैं और महान कला अपने समय से बहुत आगे होती है | श्लीलता – अश्लीलता का हौआ अक्सर राजनीति परिचालित होता है | तभी कामसूत्र  ,कुमार सम्भव और खजुराहो के देश में हालिया फिल्म ‘ रंगरसिया’ को भी अश्लीलता का आरोप झेलना पड़ा | मकबूल फ़िदा हुसैन के सर की सुपारी दी गयी | मंटो की कहानियों को बदनाम किया गया |जैसा कि नामवर सिंह कहते हैं ‘ इन रचनाओं का मुख्य अपराध यह रहा कि इन्होने पूजीवादी व्यवस्था के नैतिक ढोंग का उद्घाटन किया’ |
कला के ऊपर राष्ट्र द्रोह ,अश्लीलता,चरित्र हीनता और समाज को पथ भ्रष्ट करने का आरोप दरअसल व्यवस्था के तरकश में कला और साहित्य को बधिया करने का सबसे कारगर तीर है | कभी क़ानून कभी नैतिकता कभी राष्ट्र तो कभी धर्म के जरिये सत्ता के निहित स्वार्थ कला के लिए लक्ष्मण रेखा खींचते आये हैं और हर बार कला ने अपने अस्तित्व  को सिद्ध करने के लिए इस लक्ष्मण रेखा को लांघा है | कला की सार्थकता इसी लक्ष्मण रेखा को लांघने में निहित है |
लेकिन सार्थक कला व्यवसायिक नंगेपन और विकृत कामुकता के बीच हमेशा फर्क करते चलती है | कला में जो होता है प्रसंग और सन्दर्भ से परे और न्यूनाधिक नहीं होता | यही कला का संतुलन और कला की नैतिकता है | सार्थक कला कभी अनैतिक नहीं होती ,बस उसकी नैतिकता कई बार समाज की प्रचलित नैतिकता से बेमेल हो सकती है | जैसे ‘रंग रसिया’ में वेश्या में देवी का दर्शन और अंकन | जिसे लेकर शुद्धता और नैतिकता वादियों ने वितंडा किया था |
एक सार्थक कला सत्ता के द्वारा बाधित किये जाने के इस डर के वाबजूद भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष जारी रखती है | जैसा की ग्रॉय कहते हैं ‘कला अपने में सत्ता है’| यही वजह है कि कला का सत्ता से द्वन्द सनातन रहा है | कला का मूल चरित्र ही सत्ता की आलोचना रहा है जिसे सत्ता विद्रोह के रूप में देखती रही है | कला की प्रासंगिकता प्राकृतिक आपदा को नहीं बल्कि मानव निर्मित आपदा को अपनी विषय वस्तु बनाने में निहित है |  
प्रदर्शन कारी कला का तो जन्म ही प्रतिरोध के स्वरूप हुआ है | जैसे खून में श्वेत डब्लू बी सी नष्ट हो जाने से प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती है और उसी के साथ शरीर भी वैसे ही प्रदर्शन कारी कला से प्रतिरोध नष्ट हो जाते ही वह कला ही स्वयमेव नष्ट हो जाती है |
 याद करें नाट्य शास्त्र भरत मुनि का मिथक | स्वर्ग में देवताओं का मनोरंजन करते करते एक दिन वे उनका उपहास क्या कर बैठे , देवताओं ने उनके स्वर्ग से बेदखल कर धरती पर भेज दिया |
इस मिथक की मीमांसा जरूरी है |
कला के लिए और विशेषकर प्रदर्शनकारी कारी कलाओं के लिए एक आर्थिक आधार की आवश्यकता होती है | सत्ता कला को वो आधार उपलब्ध कराती है | पहले राज दरबारी कवि और कलाकार हुआ करते थे , आधुनिक समय में ये शासकीय और अशासकीय अनुदान जीवी कलाकार हैं |सत्ता अपने लिए उपयोगी कलाकारों को मात्र धन और सुविधा ही उपलब्ध नहीं कराती अपितु उन्हें पुरुस्कृत , सम्मानित और पीठ आदि पर बैठाकर उपत्कृत भी करती है | जब कला उस सत्ता का प्रतिवाद रचने लगती है या वह सत्ता के लिए उपयोगी नहीं रह जाती तो इन्ही सब साधन और सुविधाओं से उसे वंचित कर शक्तिहीन करने का प्रयास किया जाता है |
मिशेल फूको ने अपने लेख सब्जेक्ट आफ दि पॉवर में सत्ता की इसी प्रवृत्ति की मीमांसा करते हुए कहा है कि सत्ता अपने सामने आने वाले हर प्रतिरोध को न्यूनीकृत करती है |
सृजन कारी कला और  सत्ता के मध्य द्वंद को भीष्म साहनी के ‘हानूश’ में बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया गया है |
‘हानूश’ एक कुफ्ल साज़ है जिसका सपना घड़ी साज़ बनने का है |
सपना आसान नहीं है लेकिन संघर्ष करता हुआ ‘हानूश’ अपनी रचना यानी घड़ी बनाने में कामयाब हो जाता है |
और इसी कामयाबी के साथ तत्कालीन व्यवस्था के साथ उसका संघर्ष शुरू हो जाता है | राजा चाहता है कि घड़ी बजे लेकिन हानूश कहता है घड़ी तो अपने समय पर ही बजेगी | जब घड़ी बजती है और बाहर जनता इस रचना के लिए ‘हानूश ‘ की जयजयकार कर रही होती है राजा के हुकुम से ‘हानूश’ अंधा बनाया जा रहा होता है ताकि बह दूसरी घड़ी ना बना सके और यह रचना नायाब बनी रहे | ‘ हानूश’ की कला को लेकिन सत्ता फिर भी नहीं रोक पाती | ‘हानूश’ से घड़ी बनाने का हुनर सीखकर उसका शागिर्द को राज्य की सीमा के बाहर निकलने में कामयाब रहता है | यहाँ तक पहुंचकर ‘हानूश’ एक व्यक्ति से एक प्रवृत्ति में रूपान्तरित हो जाता है जो सत्ता के सामने अपनी रचनात्मक जिजिविषा के साथ क्षत मस्तक भले है किन्तु नतमस्तक नहीं है |
‘हानूश’ के बाद से कला और सत्ता के द्वंद का चेहरा आधुनिक स्वातन्त्र्य और विधि आधारित समाज में बदला है | चेहरा बदला है आत्मा नहीं | दमन और कठोर हुए हैं और उन्हें विधि के आवरण में अंजाम दिया जाने लगा है |
आधुनिक राज्य में कला पर नकेल क़ानून की डाली जाती है | ये क़ानून जैसे ही अपर्याप्त होते हैं नये क़ानून गढ़ लिए जाए हैं |
जैसे ‘नील दर्पण’ जैसे प्रदर्शन से घबराकर अंग्रेज सरकार ने  ‘ड्रामेटिक परफार्मिंग एक्ट’ लागू किया था | तो प्रथम विश्व युद्ध के समय सिनेमा की आलोचनात्मक शक्ति से आतंकित होकर सभी देश की सरकारों ने अपनी अपनी तरह से सिनेमेटोग्राफिक एक्ट लागू कर सेंसरशिप के जरिये कला को नियंत्रित करने की कोशिश की | यानी सत्ता कला को हमेशा कला कंद के रूप में परोसना चाहती है | सर्वथा निरापद सर्वथा अनुरूप सर्वथा उपयुक्त | लेकिन कला की सार्थकता कला कंद होने में नही उत्पीड़ित ,वंचित वर्ग के पक्ष में सत्ता का काला-कांड उजागर करने में निहित रहती है | यही कला धर्म भी है और इसी के निर्वहन में कला जोखिम में भी आती है | लेकिन जो कला यह जोखिम ना उठा सके उसे कला नहीं ‘क्राफ्ट’ कहा जाना चाहिए |
यह सवाल हर कलाकार द्वारा अपने आप से हर शुरुआत में पूछा जाना चाहिए कि उसकी कला का धर्म क्या है ? और क्या अपनी कला से वह उस कला धर्म का निर्वाह करने जा रहा है |
दुर्भाग्य से दूसरे धर्मों की तरह कला धर्म भी अपने मर्म और दर्शन से च्युत होकर कर्मकांड तक में सिमट कर रह गया है | वहां नवाचार , कल्पना और साहस की उड़ान नहीं है | बंधे बंधाये ढर्रो , परिपाटियों में कला का दम घुटा जा रहा है लेकिन भीरु और अनुदान की बैशाखियों पर टिका कलाकार उसे निरंतर अनदेखा और अनसुना कर रहा है |
आज जबकि पृथ्वी पर मनुष्य जाति का भविष्य संकट में है | बर्बर विकासको एकमात्र विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है और साम्प्रदायिक उन्माद क्रांतिकारी दर्शन की शक्ल में आ रहा है | आवारा पूँजी के पतनशील मूल्य सृजन चेतना पर हावी हो चुके हैं | मनुष्य अपनी गरिमा खोकर एक संसाधन में रूपांतरित हो रहा है | कला को सजग बौद्धिक कार्यवाही के रूप में सार्थक प्रतिवाद की भूमिका में आना होगा | कला स्वयम में लक्ष्य या साध्य नहीं है वह साधन है | कला के लिए अभ्यास से पहले दृष्टिकोण (विजन) विकसित करने की जरूरत है | कला को स्वयम कलावाद से मुक्त होने की आवश्यकता है | एक मुक्त कला ही मनुष्य जाति के मुक्ति के स्वप्न को चरितार्थ कर सकेगी  |कला की सार्थक उसे चंडीदास के शब्दों को याद रखने की जरूरत है –
“शुनहु मानुष भाई
सबाई ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे केऊ नाही”
(चित्र :गुएर्निका - पाब्लो पिकासो )


Friday, September 14, 2018

14 सितम्बर :कर्मकांड से आगे सोचना होगा

14 सितम्बर हिंदी के सरकारी कर्म कांड का दिन है ।
कहते हैं जब कर्म ना फले तो कांड अवश्य कर लेना चाहिए ।
सो आज एक निर्माणी में हिंदी पखवाड़े के दौरान मुख्य अतीथि होकर मैंने भी हिंदी कर्म का कांड किया ।
मैंने बात आमंत्रण पत्र से शुरू की । आमंत्रण पत्र में राजभाषा अधिकारी के हस्ताक्षर अंग्रेजी में थे । हिंदी की चिंदी लहराने वाले हम में से कितने अपने हस्ताक्षर हिंदी में करते हैं । कार्यालय की नाम पट्टिका और बंगले के
गेट  पर टँगा  शिलापट्ट हिंदी में खुदवाते हैं ।
हम तो अपने कुत्ते का नाम तक हिंदी या मादरी जुबान में नही रखते ।
हद तो तब हो गयी है जब मेरा कवि मित्र आपसी बातचीत में अपने बिल्डर  को श्वान और उसकी महिला मित्र को मादा श्वान कहकर संबोधित करने लगा । मैंने टोका सीधे सीधे *कुत्ता* क्यो नही बोलते तो कहने लगा *आदरणीय ...जिह्वा का स्वाद बिगड़ जाता है*
तो हम में कोई स्वाद तो कोई सम्मान बिगड़ने के डर से जीवित हिंदी से दूर जाते हुए या तो राजभाषा टाइप की बनावटी हिंदी के मुँह में जा घुसा है या अंग्रेजी के पिछवाड़े में ।
हिंदी का बंटाढार जितना विलायती टट्टुओं ने किया उससे कम तत्सम पिट्ठुओं ने भी नही किया । हाल का वाकया है मेरे मातहत अधिकारी सिर खुजाते हुए बोले *सर .. कारावास जो तीन वर्ष से अन्यून नही होगा ..अन्यून मतलब?*
मैंने कहा अंग्रेजी में देख लो ।
अंग्रेजी में उन्हें झट से समझ आ गया *नॉट लेस देन थ्री ईयर*
अब विधि का राजभाषा अधिकारी यदि *अन्यून  होगा* की जगह *कम नही होगा* लिख देता तो उसका कुछ घट नही जाता बस  हिंदी में कानून की समझ आसान हो जाती ।
जिस फेक्ट्री में आज हिंदी  कर्मकांड था वहाँ  जाते हुए चौराहे पर एक से मैंने पूछा *निर्माणी* किस तरफ है ?तो उसमें उल्टा मुझसे पूछ लिया निर्माणी मतलब ?
कारखाना कहो तो समझ आ जाता है लेकिन जब तत्सम का बेताल सर पर सवार हो तब जनता की समझ और सुविधा का ध्यान किसे रहता है ?
 उस पर तुर्रा ये कि जनता की सुविधा का ख्याल कर कामकाज हिंदी में होना चाहिए ।
कोई पूछे तो सही
*...किस हिंदी में ?*
उस हिंदी में जिसे आप ही कहिये आप ही बूझिये ...
हिंदी को इतना सँकरा मत कीजिये कि उसमें उसी की बोली बानी के शब्द ना अंट सके ।
अस्पताल से थाने से इसलिए नाक भौं मत सिकोड़िये कि उर्दू वालो ने उनसे अँकवार कर ली ।
उर्दू यदि देवनागरी में लिखी जाने लगे  हिंदी से अलग नही बैठती और बोलने में तो वो बस हिंदी की ही एक शैली नज़र आती है।
यानी झगड़े की झड़ में भाषा नही सियायत है ..बस ।
इसी का फायदा तब अंग्रेजो ने 1850 से 1900 के दौरान इसे साप्रदायिकता के रंग में रँगकर उठाया   था जब काशी नागरी प्रचारणी सभा के झंडे तले उत्तरप्रदेश में देवनागरी की लड़ाई लड़ी गयी थी क्योंकि तब थाना कचहरी सबकी लिपि उर्दू के नाम पर फारसी थी ।
*जय हिंदी जय नागरी* उस समय का नारा था ।
किसी भाषा का भाग्य शायद इतना विचित्र नही रहा हो जिसे पहली लड़ाई लिपि की लड़नी पड़ी हो।  क्रिस्टोफर किंग की किताब का शीर्षक ही है *वन लेंगवेज टू स्क्रिप्ट*
खैर तबकी सत्ता भले देवनागरी या हिंदी के साथ भले ना रही हो जनता हिंदी और देवनागरी के साथ बराबर थी । तभी प्रचार की दृष्टि से गैर हिंदी प्रदेश से आने वाले  स्वामी दयानंद सरस्वती ने1875में  सत्यार्थ प्रकाश देवनागरी में ही लिखा ।
उनसे भी 25 साल पहले गुजराती कवि नर्मद हिंदी को राष्ट्र भाषा का  दर्जा दे चुके थे ।
स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान तिलक, गांधी और राजा राम मोहन राय सभी ने हिंदी को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर आगे बढाया ।
वे जानते थे आज़ादी की लड़ाई भाषा की लड़ाई के वगैर अधूरी रहेगी ।
लेकिन आज आज़ादी के सत्तर बरस बाद हिंदी कहाँ है ? इससे भी पहले ये पूछना ज़रूरी है कैसी है ?
भूमंडळीकरण के दौर में उसे  बड़ी कुटिलता से विपन्न और विस्थापित किया जा रहा है ।
देशज और लोक भाषा से उसकी दूरी बढाई जा रही है ताकि उससे स्मृति विहीन और प्रतिरोध विहीन किया जा रहा है ।
प्रभु जोशी के शब्दों में कहें तो *हिंग्लिश को हिंदी की हत्या सुपारी दी जा चुकी है*
इस स्थिति को एक रूपक में कहे तो आज हिंदी की दशा लगभग वैसी ही है जी किसी नदी की राह में पहाड़ धसक जाने से होती है यानी ना वह बह पाती ना कुंड हो पाती । छिछला जाती है बस ।
हिंदी के रास्ते मे ये पहाड़ भूमंडळीकरण के दौर में अंग्रेजी का है जिसने
प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में और अब सोशल मीडिया में भी हिंदी भाषा और लिपि में अंग्रेजी की सायास घुसपैठ कर हिंदी को विस्थापित किया जा रहा है ।
अंत मे निर्णायक हमला त्रिनिनाद और गुयाना कीतरह होना है जहाँ 40 प्रतिशत हिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी को फ्रेंच या अंग्रेजी लिपि में लिख रहे है।
भाषा के विलुप्त होने की यह शुरुआत है ।भूमण्डलीकरण के  ग्लोबल विलेज बाज़ार में बोली और भाषा पहले कुपोषित होकर अशक्त होती है और फिर दम तोड़ देती है
भूमंडळी करण के पैरोकार बड़ी चतुराई से भाषा को मात्र सम्प्रेषण का माध्यम बताकर इस बहस को अपने पक्ष में करना चाहते हैं ।
जबकि भाषा मात्र सम्प्रेषण का माध्यम नही एक सांस्कृतिक चेतना के साथ प्रतिरोध की वाहक भी है। वह अपने भाषी समाज का इतिहास उसकी धरोहर भी है ।
जब कोई शब्द छीजता है तो उस शब्द के साथ एक इतिहास एक चेतना एक संस्कृति भी छीज जाती है । ये मसला डेविड क्रिस्टल के कथन से आगे का है *एक शब्द की मृत्यु एक व्यक्ति की मृत्यु है*
14 सितम्बर के दिन हिंदी का कर्म कांड करते हुए इन ज़रूरी सवालों से यदि दो चार हुआ जा सके तो यही इसकी सार्थकता होगी ।

Thursday, May 25, 2017

25 मई :जन संस्कृति दिवस

http://iptanama.blogspot.in/2017/05/25.html?m=1

THURSDAY, MAY 25, 2017

25 मई :जन संस्कृति दिवस के बहाने

-हनुमंत किशोर 

‘जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यतः पीछे रह जाएंगे
सेनाएँ हो जाएंगी पार मारे जायेंगे रावण
जयी होंगे राम
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलायेंगे’ ...”अज्ञेय’’

“अज्ञेय” की इन पंक्तियों से बात शुरू करने पर कुछ लोग की पेशानी पर बल पड़ सकते हैं लेकिन इन पंक्तियों से सटीक कोई और पंक्ति जन संस्कृति दिवस की अहमियत को इंगित करने के लिए मेरे पास नहीं है |
25 मई भारतीय जन नाट्य संघ ,‘इप्टा’ का स्थापना दिवस है | जिसे देश भर में संस्कृति कर्मी जन संस्कृति दिवस के रूप में मनाते हैं | 

हालांकि आज संस्कृति पर जिस तरह से एक ख़ास वर्ग का फासीवादी प्रभुत्व स्थापित हो चुका है वहां संस्कृति की हटकर कोई भी विवेचना राष्ट्र द्रोही और संस्कृति द्रोही घोषित किये जाने के खतरे तक ले जा सकती है लेकिन राष्ट्र और संस्कृति दोनों को बचाने के लिए हर संस्कृति कर्मी को इस खतरे से टकराना ही होगा |

ठीक उसी तरह जिस तरह से आज से 75 बरस पहले “इप्टा” अपनी स्थापना के समय औपनिवेशिक सत्ता के उत्पीडन से टकराई थी | ‘इप्टा’ मात्र रंगकर्मियों , संगीतकारो , साहित्यकारों , कलाकारों का संगठन मात्र नहीं था बल्कि एक संगठन बतौर यह राष्ट्र और समाज की मुक्ति का स्वप्न भी था | 25 मई 1943 को मुम्बई में इप्टा की जब औपचारिक स्थापना की गई तब उस समय के कला और लेखन के क्षेत्र के आइकान समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता घोषित करते हुए “इप्टा” के आन्दोलन से जुड़े थे जैसे ख्वाजा अहमद अब्बास, पंडित रविशंकर, कैफी आजमी, ए के हंगल, साहिर लुधियानवी, दीना पाठक, विमल रॉय, मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र, शंभू मित्रा, होमी भाभा, बलराज साहनी, प्रेमधवन, सलिल चौधरी, चित्तो प्रसाद, हेमंत कुमार, उत्पल दत्त, रित्विक घटक, तापस सेन, उदयशंकर, आदि | एक आन्दोलन के रूप में इप्टा औपनिवेशिक शासन से आजादी के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता से भी आजादी का सवाल उठाते हुए देश की सांस्कृतिक फिज़ानव निमार्ण कर रही थी | अछूत और कलात्मक समझे जाने वाले विषय और लोग दोनों ही कला की दुनिया में केंद्र में स्थापित हो रहे थे | श्रम और श्रमिक की मंच पर प्रतिष्ठा हो रही थी कला और साहित्य का नया सौन्दर्य शास्त्र रचा जा रहा था | कला और मंच पर अभिजात्य की इजारेदारियां टूट रही थी | विपन्न, शोषित वर्ग जब कला का सृजन करता है उसमे एक द्रोह और दुःख होता है प्रतिशोध की धमक होती है | ‘इप्टा’ पुरानी संवेदना से अलग नये जमाने के स्वप्न और सम्वेदना से कला को आंदोलित कर रहा था। कला अपनी जकड़न से मुक्त होकर सम्भावना के नये क्षितिज तलाश रही थी |

आज भी ‘इप्टा’ की स्प्रिट वही है बकौल शबाना आजामी “इप्टा सिर्फ रंगमंच नहीं है विचार है। ऐसा विचार जो कला के माघ्यम से दुनिया को बदलना चाहती है।“

इसी विचार की पृष्ठ भूमि से जन संस्कृति दिवस की अवधारणा ने जन्म लिया है|

जन और संस्कृति दोनों एक दूसरे से असम्पृक्त होकर अपनी शक्ति और सम्भावना से स्खलित होते हैं |
दोनों की मुक्ति एक दूसरे में निहित है | जन की तरह संस्कृति भी जंजीरों में जकड़ी जाती है | उसे उसके मूल से विछिन्न कर कृत्रिम वातावरण में विकसित किया जाता है और वह विपणन का पण्य होकर उपभोक्ता तैयार करने की मशीन बना दी जाती है |

संस्कृति के छाते के नीचे उस समाज के समूचे सामाजिक आचार व्यवहार और मानक समाहित होते हैं इस तरह से हर संस्कृति के दो रूप हैं भौतिक और अधिभौतिक | भौतिक रूप में संस्कृति में समाज की समूची भौतिक उपलब्धियां शामिल है जिसे एक अर्थ में हम सभ्यता भी कहते हैं अधिभौतिक रूप में हमारे सभी जीवन मूल्य , कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, धर्म , रीतिरिवाज, परम्पराएँ, पर्व विचार , आदर्श , आदि सम्मलित किये जा सकते हैं | इस तरह से यह हमारे जीने और सोचने का समग्र संकुल होकर हमारे देशकाल के मूर्त-अमूर्त की अभिव्यक्ति भी है |

संस्कृति जैसा कि अपने नाम से ही ध्वनित है बनायी हुई होती है | यह सामाजिक प्रक्रिया द्वारा अर्जित और निरंतर विकसित की जाती हैं | यह प्रकृति का विलोम नहीं तो उसका पूरक अवश्य रचती है | पीढ़ी दर पीढ़ी सामाजिक व्यवहार की विशिष्टताओं के रूप में इसका निगमन होता है। यह संचय , विकास और क्षरण में गतिमान रहते हुये हमारी सामाजिक सरंचना और वैयक्तिक जीवनपद्धति का व्यवस्थापन करती चलती है |आदिम रूप में इस तरह जन अपनी संस्कृति को रचते है और संस्कृति अपने जन को रचती है |

मैक्सिम गोर्की इसे ही लक्ष्य कर कहते हैं –‘संस्कृति की निर्मात्री जनता है |’

लेकिन आदिम समाज की टूटन के साथ जैसे जैसे वर्ग समाज का उदय होता है जन और संस्कृति का यह सीधा सरल सम्बन्ध टूटने लगता है और शासक वर्ग संस्कृति पर अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए उसे अपने वर्गीय हितो का औजार तक बना डालता है | इस प्रक्रिया और आंतरिक संघर्ष में संस्कृति के दो छोर निर्मित हो जाते हैं एक पर आभिजात्य संस्कृति होती है तो दूसरे पर लोक संस्कृति | कालान्तर में मीडिया और जन संचार के माध्यमो ने संस्कृति का एक और स्वरूप विकसित किया जिसे लोकप्रिय संस्कृति यानी पापुलर कल्चर या पॉप कल्चर कहा गया | हमारे देश में इसकी ताज़ा मिसाल फ़िल्मी कल्चर है जिसने शादी –ब्याह,नाच-गाने के नये पैटर्न सर्व ग्राह्य बना दिये | मैथ्यू आर्नल्ड अपनी पुस्तक ‘कल्चर और एनार्की’ पुस्तक में पॉपुलर कल्चर को विद्यमान प्रमुख संस्कृति के संदर्भ में रेखांकित करते हुए पॉपुलर कल्चर के उदय को ब्रिटेन की उद्योग क्रांति या आर्थिक क्राति के संदर्भ में देखते हैं। वर्ष 1860 तक ब्रिटेन की संसद में वोट का अधिकार नगर के कुछ संभ्रान्त-कुलीन एवं शिष्ट लोगों को ही प्राप्त था लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के साथ मध्यवित्तीय वर्ग के महत्व एवं कामगार वर्ग के उदय के कारण इस व्यापक वर्ग ने भी ब्रिटेन संसद में वोट के अधिकार की मांग की। मैथ्यू आर्नल्ड इसके पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि इस वर्ग के पास पर्याप्त अनुभव नहीं है और इस अनुभवहीन, अपरिपक्व बौद्धिकता को यदि यह अधिकार मिलता है तो अराजकता की स्थिति संस्कृति में भी आ सकती है। अतः आर्नल्ड की कुलीन चेतना शिष्ट संस्कृति से बाहर की समस्त संस्कृति को ‘एनार्की’ के रूप में ही देख पाती है। मैथ्यू आर्नल्ड ही नहीं वरन् उस युग के सभी प्रतिष्ठित संस्थानों ने पॉपुलर कल्चर को शंका की दृष्टि से देखा।मैथ्यू अर्ल्नाल्ड से आगे जाकर वाल्टर बिन्जामिन पापुलर कल्चर के प्रतिरोधी प्रभाव को रेखांकित करते हैं | हम दक्षिण अमेरिकी और अफ्रीकी देशो में संगीत में ‘ब्लूज’ का जो उभार देखते है उसमे अश्वेतो की पीड़ा और प्रतिरोध सहज चिन्हित है | लोकप्रिय संस्कृति पर आरोपो के जवाब में वाल्टर बेंजामिन कहते हैं ‘पॉपुलर कल्चर जीवन का संस्कार करने वाली रही हैं, लोगों ने उसे और उसमें से बहुत कुछ चुना है। सब कुछ नकारात्मक होता तो लोग उसे आनंद का कारण न समझते।

‘फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप संस्कृति’ में सुधीश पचौरी एंजेला मैकरोवा के मार्फत लिखते हैं-‘पॉपुलर कल्चर उत्तर आधुनिक स्थितियों में उन आवाजों का कलरव है, जिन्हें आधुनिकतावादी महावृत्तान्तों में दबा दफना दिया था जो मूलतः साम्राज्यवादी और पितृसत्तात्मक थे।‘ यहाँ उच्च और निम्न का भेद जाता रहता है | लेकिन लोक प्रिय संस्कृति को लोक या जन संस्कृति समझना भूल होगी |

एडार्नो इसी पापुलर कल्चर को मॉस कल्चर में देखते है और इसके उस चरित्र को रेखांकित करते है जिसे सांस्कृतिक उद्योग की संज्ञा दी जाती है | ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया में यह सांस्कृतिक उद्योग खूब फलता –फूलता है और स्थानिकता को प्रतिगामी बताकर हटाता चलता है | स्थानीय और लोक संस्कृति को हीन ठहरा दिया जाता | 

आज बाज़ार की सर्वग्रासी लोलुपता से संस्कृति और कला भी नहीं बच सकी है | और उसने कला-संस्कृति को भी उपभोग का विषय बना दिया है | 

रेमंड विलियन जहाँ संस्कृति के सामाजिक आधारों और उसके उपभोगवादी चरित्र की मीमांसा करते हैं | वे बताते है कि उपभोक्ता वादी संस्कृति के प्रभुत्व से कला और काव्य भी विच्छिन्न (एलियनेशन) का शिकार हुए हैं और वे व्यापक सामाजिक प्रक्रिया से विच्छिन्न होकर उपभोग या आस्वाद की एक वस्तु बनकर रह गये हैं | वो धीरे से ‘आनर प्राइड’ में बदल जाती है और ‘विश करो डिश करो’ के इंद्रजाल में बदल जाती है |
वहीँ अन्तानियों ग्राम्शी ‘हेजीमनी’ की अवधारणा से यह बताते हैं कि किस तरह संस्कृति में लोक के जीवन मूल्य प्रभु वर्ग यानी एलीट क्लास के मूल्यों द्वारा विस्थापित कर दिए जाते हैं |


‘इप्टा’ उस संस्कृति की वाहक है जिसका असली नायक श्रमजीवी और समाज की मुक्ति के लिए संघर्षरत कलाकार ,बुद्धिजीवी है | इस संस्कृति में व्यक्तिवादी आग्रह नहीं सामूहिक चेतना है | ‘आई शेल ओवर कम ‘ को पीट सीगर जब ‘वी शेल ओवर कम’ बनाकर जन गीत बना देते हैं तो सर्व जन हिताय की यही सामूहिक चेतना अभिव्यक्त होती है | यहाँ कला विगत के विवेचन के साथ बेहतर भविष्य का आह्वान बन जाती है | जो समाज अपने विगत और भविष्य से प्रेम करता है वही अपनी संस्कृति से प्रेम कर सकता है और उसके लिए जोखिम भी उठा सकता है जैसा कहा जाता है – brave do not abandon their culture .

इस तरह जनता की संस्कृति के प्रतिरोधी तत्वों की पहचान कर जीवन विरोधी संस्कृति से मुकाबिला किये जाने की ज़रूरत है | इसके लिये संस्कृति कर्मी जनता की सामूहिक स्मृति में उतरता और उस स्मृति से प्रतिरोध रचना होगा | औपनेवेशिक , उपभोक्ता संस्कृति जहाँ स्मृति हीनता रचती है वहीँ जन संस्कृति स्मृति रचती है | जन संस्कृति अपनी जीवन शक्ति लोक और विचार से ग्रहण करती है लोक में आज भी दीपक बुझाया नहीं बढ़ाया जाता है |वहां नदी-वृक्ष-पहाड़ का मानवीयकरण है|

रात को वृक्ष को छूना मना है क्योंकि वह सोया होता है | पृथ्वी पर पाँव रखने से पहले पृथ्वी की क्षमा याचना की जाती है | लोक इस तरह अपनी संस्कृति में अपने परिवेश को जीवंत बनाकर संस्कृति को भी जीवंत इकाई बना देता है | लेकिन लोक के अपने अन्तर्विरोध भी हैं, अपना श्रेणीकरण और विभेद हैं | सामन्ती मूल्यों की प्रतिष्ठा है | जन संस्कृति इस श्रेणीकरण और विभेद का प्रतिवाद रचते हुए , प्रगतिशील मूल्यों को केंद्र में प्रतिष्ठित करती है | 

जन संस्कृति में कला का एक सामाजिक स्पेस है जिसमे सृजनात्मक आनन्द और सामाजिक सरोकार आपस में सम्पृक्त हैं |

सर्वग्रासी और एलियेनेट करने वाली संस्कृति के विरुद्ध सम्भावना सिर्फ इसी जन संस्कृति में निहित है और कलाकारों ,बुद्धिजीवियों , लेखकों के लिए जन संस्कृति दिवस का संदेश भी है | कम से कम आज के दिन तो बकौल मेक्सिम गोर्की पूछा जा सकता है कि 
कला के कर्ण धारों 
तुम किस ओर हो 
फासीवाद के साथ 
या फासीवाद के खिलाफ लड़ने वालों के साथ ?..।।


Monday, February 13, 2017

लोग मोहब्बत को हर दौर में मारेंगे

लोग मोहब्बत को हर दौर में मारेंगे
+++++++++++++++++++++++++
वेल्नेटाइन डे पर इस बार भी संस्कृति के स्वयम्भू ठेकेदारों से  खतरा है |
हालांकि इस बार कई चतुर अपील भी सोशल मीडिया पर धूम रही हैं
मसलन
‘इस दिन भगत-सुखदेव-राजगुरु को फांसी की सज़ा सुनाई  गयी थी इसलिए इसे प्रेम नहीं बलिदान दिवस के रूप में मनायें’
'प्रेम के लिए एक दिन ही क्यों हर दिन प्रेम का दिन है '
 और यह भी कि प्रेम ही करना है तो एक व्यक्ति से नहीं समूची सृष्टि से करो |
गोया भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी प्रेम के खिलाफ़ हों , एल दिन प्रेम दिन मना लेने से दूसरे दिन प्रेम नहीं कर सकेंगे और जैसे कि व्यक्ति सृष्टि से बाहर हो |
खैर जब भी प्रेम के खिलाफ कोई विचार, फतवा या पंचायत खड़ी होती है मुझे एक दोहा बरबस याद आता है |
जो है तो अमीर खुसरो का  लेकिन अब ये लोक की धरोहर बन  चुका है
दोहा कुछ ऐसा है कि
“कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयों मांस
दुई अँखियाँ मत खाइयो
पिया मिलन की आस ||”
अब इस दोहे में बहुत साफ़ है कि प्रियतम से मिलने की आस में एक विरहणी तड़प- तड़प कर निश्चेष्ट हो चुकी है कि उसे मरा जानकर कागा यानी कौआ यानी उसके प्रेम का दुश्मन उसे खाने आ पहुचा है | विरहणी की काग से प्रार्थना है कि सारा शरीर खा ले सिवाय दो आँखों के जिनमे प्रियतम के आने की उनसे मिलने की उम्मीद अभी भी शेष है |
यह दोहा उम्मीद के पक्ष में , जो कि प्रेम शत्रु समाज में जीवित रहने का एक मात्र आधार है पर कही गयी सबसे लोकप्रिय काव्यात्मक अभिव्यक्ति है |
इस दोहे की लोक प्रियता इस बात का प्रमाण है कि समाज में एक छोटा सा वर्ग आज भी प्रेम को जीवन की जरूरत मानता है और वहीँ समाज का एक बड़ा वर्ग उसके प्रेम के इस अधिकार को सर्वथा नकारता ही नहीं अपितु अपराध और दंड के खांचे में देखता है |
हमारा देश इस मामले में आज भी तालिबानी सोच के खिलाफ खड़ा नहीं हो सका है जो मज़हब के दायरे से बाहर प्रेम को गुनाह समझता है और गुनाहगार को सज़ा देना जहाँ पुण्य यानी सवाब का काम है | और खाप पंचायत नुमा सोच इस पुण्य लाभ को किसी और के साथ बांटना नहीं चाहती अकेले ही कमाना चाहती है |
कथाकार अवधेश प्रीत की एक कहानी है “चाँद के पार चाभी” |
दलित नौजवान के प्रेम की कहानी है |
जिसमे कथाकार यह सवाल उठाता है कि हमे प्रेम का अधिकार कब मिलेगा ?
और हैरानी की बात है कि हमारे देश का कानून जहाँ शिक्षा, खाद्य , रोजगार आदि को तो जीने के अधिकार में शामिल करता है लेकिन प्रेम के अधिकार पर मौन रह जाता है |
अब बिना प्रेम के अधिकार के हम कैसा प्रेमहीन समाज निर्मित कर सकते हैं , यह विचार का प्रश्न है | लेकिन जहां इसे खुलकर कोई उठाने को कोई तैयार नहीं होता वहीं इसके खिलाफ खड़ी खौफ़ की मूर्तिमान कथित पंचायतें और ऐसे ही सोच से परिचालित संगठन अपना एजेंडा डंडे के जोर पर लागू करने में कोई कसर नही उठा रखते |
इस खौप की बानगी बागपत के उस परिवार के दर-दर भटकने में देखी जा सकती है जिसे एक लड़की से प्रेम करने और घर से भगा ले जाने के एवज में खौफ़ की मूर्तिमान कथित पंचायत ने हुकुम सुनाया कि लड़के की बहनों से बलात्कार कर उन्हें नंगा घुमाया जाये |
सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर परिवार को सुरक्षा मुहैया करानी पड़ी |
विवाह से बाहर के सम्बन्ध के आरोप पर ऐसी खौफ की मूर्तिमान कथित पंचायतो द्वारा महिलाओं के चीर हरण का हुकुम तो सामान्य बात है अभी पिछले साल एक मामले में समान गोत्र में शादी करने वाले पति को अपनी पत्नी को बहन मानकर उसे दस रुपए का शगुन देने का हुकुम हरियाणा के करनाल में ऐसी ही पंचायत ने सुना दिया | तब अपनी शादी और प्रेम बचाने के लिए पति-पत्नी को अंततः अदालत की शरण लेनी पड़ी थी |
शायद आपको याद हो २००७ में मनोज –बबली के मामले से जुड़कर ऐसी ही कथित पंचायत ने किस तरह खौफ़ कायम किया था |
उस कुख्यात आनर किलिंग के बाद से इनका खौफ़ बदस्तूर जारी है |
“श्री राधा-कृष्ण” के उपासक देश की यह भारी विडम्बना कही जानी चाहिये कि यहाँ प्रेम करना पविवार के सम्मान के विरुद्ध समझा जाता है |
समाज-जाति-परिवार का कोई व्यक्ति चोरी करे , बेईमानी करे, हत्या और बलात्कार करे तो उस समाज-परिवार का सम्मान खतरे में नहीं पड़ता लेकिन प्रेम करते ही सम्मान खतरे में पड़ जाता है |
प्रेम को परिवार के सम्मान के विरोध में देखना आज से नहीं है बल्कि इसकी जड़े प्राचीन समय-समाज तक जाती हैं किन्तु हालिया वर्षों में इस सम्मान हत्या और प्रेम विरुद्ध मानसिकता से जन्मे अपराधों में जबर्दस्त उछाल आया है | संसद में तत्कालीन मंत्री श्री हसंराज द्वारा जानकारी दी गयी थी कि सन २०१४ में जहाँ सम्मान हत्या के २८ मामले सामने आये थे वहीं २०१५ में ऐसे २५१ मामले पंजीबद्ध हुए याने सीधे ८०० % की बढ़ोत्तरी |
इस आंकड़े से समझा जा सकता हमारी सम्वेदना और सोच कितनी तेज़ी से बर्बर हुई है | ‘नीतीश कटारा’ हत्याकांड आज भी ज़ेहन में ताज़ा है तो कुछ एक महीने पहले ही राजस्थान के डून्गुरपुर में अंतर्जातीय विवाह के कारण युगल जान से हाथ धो बैठा | दरअसल सम्मान हत्या को उल्टा पढ़ने की जरूरत है यानी हत्या का सम्मान |
ये सिर्फ और सिर्फ मध्य युगीन सोच से जन्मी पितृ सत्तात्मक दकियानूस सोच का बर्बर प्रदर्शन है |
जहाँ स्त्री जमीन की तरह निर्जीव भोग्य वस्तु है और जिसे किसी तरह के आत्म निर्णय का अधिकार नहीं है | मनुष्य विरोधी यह सोच इस जमीन पर खड़ी है कि विवाह और सम्बन्ध जैसे प्रश्न निजिता से बाहर है और उनके मामले में दूसरो का फैसला ही सर्वोपरी है |
पिछले बरस ही उत्तरप्रदेश के बरेली जिले का जघन्य मामला सामने आया था जिसमे प्रेम सम्बन्ध को सम्मान के लिए खतरा मानकर एक लड़की को उसके चार भाइयों ने पीट पीटकर मार डाला था | इस नृशंस घटना ने मेरे ज़ेहन में हिन्दुस्तान की एक क्लासिक प्रेम कहानी की याद ताज़ा कर दी थी वो थी “मिर्जां -साहिबा” |
साहिबा और मिर्जा का इश्क बचपने का था | लेकिन साहिबा की शादी उसके घरवाले कहीं और तय कर दी | बारात के घर पहुँचने के पहले साहिबां मिर्जा के साथ उसकी घोड़ी पर बैठकर भाग गयी |
साहिबां के सातों  भाई उनका पीछा करते हैं और उन्हें पकड़ने में कामयाब होते हैं और मार डालते हैं | भाइयों की चिंता में मिर्जा का तरकश दूर छिपा देने वाली बहन अपने भाइयों के ऑनर की किलिंग का शिकार बनती है |
हमारे देश में प्रचलित अनेक प्रेम क्लासिक इसी तरह की ऑनर किलिंग के ही मामले हैं |
एक अन्य लोकप्रिय किस्सा ‘हीर-रांझे’ का है |
किस्से में ‘हीर’ का विवाह खेड़िया के संग हो जाता है |
‘रांझे’ से प्रेम के कारण खेड़िया से अलग होकर ‘हीर’ ‘रांझे’ से शादी करने को होती है लेकिन अपनी झूठी इज्जत को बचाने के गुमान में उसके अपने बाप-चाचा साजिश कर ‘हीर’ को ज़हर दे देते हैं |
इसी तरह ‘सोहनी-महिवाल’ का किस्सा याद करें |
सोहनी, महिवाल से मिलने घड़े की मदद से दरिया पार उतरती है |
सोहनी की ननद इसे देख लेती है और परिवार के कथित सम्मान को बचाने के लिए पक्के घड़े को कच्चे घड़े से बदल देती है |
इस तरह एक झूठा सम्मान , सोहनी की बीच दरिया में जान ले लेता है |
लेकिन इन लोक कथाओं से बाहर आज भी प्रेम करना यदि किसी की हत्या का सबब बनता है तो फिर यही कहना चाहिए कि चाँद पर पहुंचने और आसमान पर पुल बना लेने के विकास के दावे के बावजूद भी हमारे भीतर नफरत का सौदागर निरंतर बर्बर हुआ है और हमे आज भी सभ्यता और संस्कृति का पाठ “ढाई-आखर” से शुरू कर सीखने की जरूरत है |जाति-पांति से सडांध मारते समाज  का उद्धार  अंर्तजातीय प्रेम और विवाह से ही किया जा सकता है |
 लेकिन फिलहाल सवाल यह है कि संस्कृति और देश के सम्मान की रक्षा के नाम पर संस्कृति के गुंडो द्वारा  निरीह-बेबस और अपने लिए एकांत तलाशते निरुपाय प्रेमी युगलों  कब तक खदेडे जाते रहेंगे  |
इस पूरे मंजर को देखकर यही सवाल कौंधता है ..
“हाथों में वही पत्थर, गलियों में वही लड़के,
क्या लोग मोहब्बत को हर दौर में मारेंगे?”
जवाब की आपसे दरकार रहेगी ||
||हनुमंत किशोर ||
[ पुनश्च : कामदेव के देश में प्रेम करने वालों का उत्पीड़ित और प्रताड़ित  होना सांस्कृतिक अधोपतन का संकेत है ...क्या uno जैसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन को मानवाधिकार दिवस की तर्ज़ पर प्रेम अधिकार दिवस भी घोषित नहीं करना चाहिये ?]